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कोसी नदी में हिमालय से भरने लगी गाद, नहीं चेते तो सिर्फ बालू ही बचेगा

3 वर्ष पहले
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सहरसा. कोसी नदी में मिट्‌टी की उर्वरक क्षमता बढ़ाने वाले औषधीय पांक (जैविक कार्बन) की मात्रा हिमालय क्षेत्र में वनों की कटाई से घटती जा रही है जिससे पांक कम और गाद ज्यादा आने लगी है। अगर हिमालय में वनों की कटाई का यही हाल रहा तो 5 से 10 सालों में कोसी तटबंध के अंदर खेती की जमीन नहीं, बालू ही बालू दिखेगा। पूर्वी कोसी तटबंध करीब 125 किलोमीटर और पूर्वी व पश्चिमी तटबंध के बीच की दूरी 8 से 11 किलोमीटर है। दोनों तटबंध के बीच 388 गांव में लाखों की आबादी रहती है। कोसी में बाढ़ का पानी जब खेतों में जमा होता है तो नदी के ये जैविक कार्बन जमीन में समा जाते हैं। पानी उतरने के बाद जब इस जमीन पर खेती होती है तो बिना उर्वरक के किसानों को अच्छा उत्पादन मिलता है। 

 

 

खेत की मिट्‌टी में बढ़ जाती है नाइट्रोजन 

 हरेक साल कोसी नदी में हिमालय से पानी के साथ आने वाली जैविक कार्बन मिट्टी की उर्वरा क्षमता को बढ़ाती है। जिससे मिट्टी में उपलब्ध नाइट्रोजन की मात्रा भी बढ़ जाती है। इसलिए कोसी तटबंध के अंदर रबी फसलों में मक्का, गेहूं व सरसों सहित सूर्यमुखी फसलों की उपज अधिक होती है। जबकि माह फरवरी से मई व जून तक गरमा फसलों में मुख्य रूप से मूंग व केलाई संभव हो पाता है।
-बिमलेश पांडे, वरीय कृषि वैज्ञानिक

 

 

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