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डाउनलोड करेंफ़ैसल मोहम्मद अली
बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर से
पुराने शहर की भीड़ में खड़ी वह औरत. न जाने ऐसा क्या हुआ कि उनके सब्र का बांध टूट गया.
आंसू आंखों से लगातार बह रहे थे, तेज़ होती हिचकियों के बीच वह कुछ कह रही थीं लेकिन मैं बस \'मोहताज\' और \'ख़ुदा के लिए मदद\' जैसे लफ़्ज़ सिसकियां मिली उनकी बोली में किसी तरह समझ पाया.
उनकी ज़बान नहीं समझ सकता था मैं, लेकिन किसी के सामने हाथ फैलाने की वो शर्म जो उनके चेहरे पर साफ़ झलक गई थी, उसे महसूस कर एक बार ऐसा लगा कि उन्हें गले से लगाकर कहूं कि सब ठीक हो जाएगा.
या कम से कम उनके सिर पर हाथ रखकर उन्हें सांत्वना तो दूं ही. लेकिन मर्यादाएँ आड़े थीं.
दिलशाद, अपना नाम उन्होंने बाद में पूछने पर बताया, किसी सभ्य परिवार की महिला थी और ज़िंदगी में शायद ही किसी से कभी कुछ मांगा होगा, कम से कम किसी अंजान व्यक्ति से तो नहीं.
मजबूरी और हालात इंसान से क्या नहीं करवा देते.
बिखर गया आशियानाजिस दिन उफनते झेलम का पानी अपने किनारों को तोड़ता श्रीनगर शहर में घुसा दिलशाद अपने शौहर और दो बच्चों के साथ घर में बैठी थीं.
उनकी आंखों के सामने घर का एक हिस्सा ढह गया और घर का सारा सामान पानी के तेज़ रेले में दूर और दूर होता चला गया, अभी संभलने का मौक़ा भी न मिला था कि कुछ ही क्षणों में दूसरा हिस्सा भी तिनकों की तरह बिखरने लगा.
दिलशाद और उनके दो बच्चे बाढ़ के तेज़ पानी में डूबते उतराते बहने लगे और तेज़ पानी उन्हें काफ़ी दूर ले गया. मगर शायद ज़िंदगी की सांसें अभी बाक़ी थीं कुछ लोगों ने इन सबको निकाल लिया.
वो कई दिनों की मशक्क़त के बाद अपने इलाक़े में तो पहुंच गई हैं लेकिन अब उनकी और परिवार की रातें कभी मस्जिद में और कभी किसी पड़ोसी के घर के किसी कोने में बीत रही हैं.
और दिन अक्सर सड़क के किनारे.
कोई जवाब नहींजवान बेटी को उन्होंने किसी रिश्तेदार के घर रख छोड़ा है, कहती हैं उसे कैसे अपने साथ सड़कों पर लिए लिए फिरूं और \'उसकी इज़्ज़त बचाती फिरूं.\'
लेकिन उसकी फिक्र उन्हें हर वक़्त सालती रहती है.
कहती हैं कि मेरे शौहर को सालों से कैंसर है और गुज़ारे के लिए जो दुकान खोली थी वो बह गई \'अब मैं क्या करूंगी, इन हालात से कैसे लड़ूंगी.\'
इन सवालों का कोई जवाब नहीं था मेरे पास. मैं उनकी तरफ़ पानी की बोतल बढ़ाता हूं और उन्हें ख़ुदा हाफ़िज़ कहके सिर झुकाए आगे की तरफ़ बढ़ जाता हूं.
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