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फुटबॉल विश्वकप में क्वालिफाई नहीं कर सका चीन, पर 35% के साथ बना तीसरा सबसे बड़ा प्रायोजक देश

दुनिया में 3.2 अरब से ज्यादा लोग विश्वकप फुटबॉल देख रहे हैं। इनमें सबसे ज्यादा चीन के ही लोग हैं।

Danik Bhaskar | Jul 08, 2018, 02:09 AM IST
फीफा वर्ल्ड कप के चीन और साउथ क फीफा वर्ल्ड कप के चीन और साउथ क

स्पोर्ट्स डेस्क. पिछले चार साल में दुनिया कितनी बदल गई है, इसका अंदाजा विश्वकप फुटबॉल के स्पॉन्सर्स को देखकर भी लगाया जा सकता है। टूर्नामेंट के तीन प्रमुख स्पॉन्सर में से एक चीन है, जबकि 2014 में वह कहीं भी नहीं था। स्पॉन्सरशिप में चीन का योगदान 35% के करीब है। टूर्नामेंट को स्पॉन्सर कर रही 12 बड़ी कंपनियों में से चार चीन की हैं। दुनिया में 3.2 अरब से ज्यादा लोग विश्वकप फुटबॉल देख रहे हैं। इनमें सबसे ज्यादा चीन के ही लोग हैं।2006 से जापान की कंपनियां एशियाई ब्रांड्स का प्रतिनिधित्व विश्व कप में करती थीं, लेकिन अब इसमें एक-तिहाई भागीदारी चीन कर रहा है। चीन के उतने ही स्पॉन्सर हैं, जितने अमेरिका के हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि चीन की राष्ट्रीय टीम वर्ल्डकप में क्वालिफाई ही नहीं कर सकी है। चीन ने फुटबॉल विश्वकप बस एक ही बार 2002 में खेला है।

ऐसा क्यों हुआ?

दरअसल चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग फुटबॉल के बड़े फैन हैं। चीन के लिए उनके तीन सपने हैं। एक- वह विश्वकप में भाग ले। दूसरा- वह इसकी मेजबानी करे और तीसरा- चीन जीते। चीन में फुटबॉल स्कूलों में जमकर निवेश किया जा रहा है। साथ ही यूरोपीय टीमों से प्रशिक्षण लेकर उनके स्तर का खेल सीखा जा रहा है। एक अरब 37 करोड़ से ज्यादा की आबादी में प्रतिभाएं ढूंढ़ी जा रही हैं।

चीन स्पॉन्सरशिप के मामले में जापान से आगे निकला

1982 से देखा जाए तो विश्वकप 6 बार यूरोपीय देशों ने जीते हैं। इसके बाद लेटिन अमेरिकी देश तीन बार जीते। 1986 में यूरोप की चार, एशिया की चार और उत्तरी अमेरिका की चार कंपनियों ने स्पॉन्सरशिप दी थी। 1990 के दशक में उत्तरी अमेरिकी देशों की स्पॉन्सरशिप बढ़ गई। चूंकि यूरोप के देशों की टीमें जीतती थीं, लिहाजा यूरोपीय कंपनियां इस आयोजन में पैसे लगाती रहीं। लेकिन 2018 में मात्र एक ही यूरोपियन कंपनी ने इसे स्पॉन्सर किया है। इस साल का सबसे बड़ा स्पॉन्सर एशिया है। एशिया में भी चीन सबसे आगे है। इसके पहले तक एशिया का सबसे बड़ा स्पॉन्सर इस आयोजन में जापान हुआ करता था। लेकिन अब चीन ने जापान को इस मामले में पीछे कर दिया है।

​रिपोर्ट- वर्ल्ड इकोनॉमिक फाेरम