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महाभारत 2019: जनता विपक्ष को एकजुट होने पर मजबूर करेगी- गौहर रजा का विश्लेषण

देश के राजनीतिक इतिहास का ऐसा मोड़ जिसमें जनता की चेतना राजनीतिक दलों से आगे चल रही है।

Dainik Bhaskar

Jun 20, 2018, 08:03 AM IST
पेशे से वैज्ञानिक गौहर रजा उर्दू के मशहूर कवि, सामाजिक कार्यकर्ता और डॉक्यूमेंट्री मेकर हैं। पेशे से वैज्ञानिक गौहर रजा उर्दू के मशहूर कवि, सामाजिक कार्यकर्ता और डॉक्यूमेंट्री मेकर हैं।

जवाहर लाल नेहरू ने आइडिया दिया था कि नव-स्वतंत्र राष्ट्र का आधार वैज्ञानिक दृष्टिकोण होगा। उनके आसपास सर सीवी रमन से लेकर होमी जहांगीर भाभा, एसएस भटनागर, सत्येन बोस जैसे वैज्ञानिक थे। ये उनके दोस्तों की तरह थे। दूसरी तरफ निराला, रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी, दिनकर जैसे साहित्यकार थे। यह नेहरू की कंपनी थी। एनडीए-1 में अटल बिहारी वाजपेयी के चारों तरफ वैज्ञानिक न सही, साहित्यकार तो थे ही। लेकिन, अब जो लीडरशिप आई उनमें नरेंद्र मोदी से लेकर उनके जितने भी साथी हैं, वे किन लोगों की सोहबत में रहे यह देखने की जरूरत है। ये लोग बाबाओं की सोहबत में रहे। उनसे ये प्रेरणा लेते रहे।
यह बड़ा बदलाव था। 2014 के बाद साहित्य और साइंस-टेक्नोलॉजी पर बड़ा हमला शुरू हुआ। इसमें अगुआ हमारे प्रधानमंत्री थे, क्योंकि इंडियन साइंस कांग्रेस में कोई यदि कहे कि हमने विमान बना रखे थे, गणेशजी से साबित होता है कि प्लास्टिक सर्जरी थी हमारे यहां। या कहें कि कर्ण स्टेम सेल की ईजाद थे। प्रधानमंत्री यह शुरू कर दें तो उसके तीन असर होते हैं। एक यह कि उनके मंत्री, सांसद, पार्टी के लोग सब वैज्ञानिक दृष्टिकोण के पीछे पड़ जाते हैं। हाल ही में हमने यूपी से सीताजी के जन्म को लेकर चर्चित बयान सुना था। दूसरा, आप नौकरशाही को संकेत दे देते हैं कि अब वैज्ञानिक दृष्टिकोण देश के निर्माण का आधार नहीं होगा। अब हम हर कहानी-किस्से को लेकर उसको परखने की कोशिश करेंगे। तीसरा असर यह दिखता है कि साइंस एंड टेक्नोलॉजी के बजट में कटौती हो गई और सीएसआईआर (काउंसिल ऑफ साइंस एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च) के डायरेक्टर जनरल को सारे डायरेक्टर्स को यह पत्र लिखना पड़ा कि वित्तीय आपातकाल है और आप पैसे बाहर से कमाएं। वैज्ञानिक कटोरा लेकर किसके पास जाएगा? वह जाएगा प्राइवेट इंडस्ट्री के पास या उन जगहों पर जाएगा, जहां पैसा है। आईआईटी में एक सेंटर स्थापित कर रहे हैं, जहां पंचगव्य पर रिसर्च होगी। अब तक हम कटिंग एज टेक्नोलॉजी की बात करते थे। कहते थे कि आईआईटी ऐसा काम करेंगे कि हम दुनिया के साथ खड़े हो सकें। आईआईटी खड़गपुर में अब वास्तुशास्त्र पर काम होगा। आप सरस्वती खोजने पर पैसा लगाएंगे, आप रामसेतु पर पैसा लगाएंगे। यह बड़ी चिंता की बात है इस वक्त।

सीएसआईआर का जो सालाना आउटपुट था रिसर्च पेपर का वह इन चार वर्षों में 500 पेपर सालाना घट गया है। लेकिन, हो सकता है सीएसआईआर में कुछ गड़बड़ हो तो राष्ट्रीय स्तर पर देखा गया। वहां हम 2000 से 2013 तक बहुत तेजी से बढ़ रहे थे। हमने वैज्ञानिक प्रकाशन के स्तर पर चीन को छोड़कर ज्यादातर देशों को पीछे छो़ड़ दिया था। चीन भी 2002 में हमारे बराबर था और अब वह हमसे कई गुना आगे है। हमने स्पेन को पीछे छोड़ा और इटली को भी लगभग पीछे छोड़ दिया था। अब हम 2014 से 2017 का डेटा देखें तो रिसर्च पेपर का हमारा प्रकाशन बहुत तेजी से नीचे आया है कि हम फिर 2000 के स्तर पर लौट आए हैं। यह देश के लिए बहुत खतरनाक ट्रेंड है। ये मुद्‌दे चुनावी राजनीति से इस तरह जुड़ते हैं कि आज हम जो काट रहे हैं वह सत्तर साल पहले टेक्नोलॉजी का ख्वाब देखकर हमने जो कोशिश उस वक्त की थी, उसका नतीजा है। यदि कोई सरकार साइंस-टेक्नोलॉजी में कटौती कर रही है तो जनता के स्तर पर उसे सबक सिखाना जरूरी है वरना सत्तर साल बाद हमारे आगे की पीढ़ियां इसका परिणाम भुगत रही होगी। विज्ञान के अलावा संस्कृति पर जिस तरह हमला हो रहा है, उससे भी देश पीछे जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषक के रूप में मैं यह देखता हूं कि बहुत सारी परेशानियां हमारी जनता ने उठाई हैं। बड़े अजीब से फैसले लिए गए, जिनमें नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक है। लोग परेशान हंै पर विभाजन की राजनीति ने उन्हें भ्रमित कर रखा है। जीएसटी से हम फिर भी उबर सकते हैं। लेकिन, यदि साइंस-टेक्नोलॉजी तबाह होता है, दृष्टिकोण बर्बाद हो जाता है तो वह कहीं ज्यादा खतरनाक होगा, आने वाली नस्लों के लिए।
विपक्ष को दो चीजों को लेकर खुलकर सामने आना होगा कि हमें अपनी संस्कृति और साइंस-टेक्नोलॉजी पर हमला बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है, पहली बात। दूसरी बात उन्हें ईवीएम के खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा वरना शायद विपक्ष 2019 का चुनाव जीत नहीं पाएगा। मैं वैज्ञानिक होने के नाते पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूं कि आदमी ने जो भी मशीनें बनाई हैं, उनके साथ छेड़छाड़ की जा सकती है। मेरा मानना है कि एक ही बराबरी हमें आज़ादी के साथ मिली, वह है वोट की बराबरी। बाकी सारी बराबरी ख्वाब है। वे हमें मिली नहीं हैं। उसको भी कोई हमें छीन ले चाहे भाजपा हो, कांग्रेस हो या कोई और हो, तो ठीक नहीं होगा। पिछले चुनाव में महिलाओं और युवाओं ने भाजपा के पक्ष में भारी मतदान किया था लेकिन, अब उनमें मोहभंग दिख रहा है। बेरोजगारी की दर तेजी से बढ़ी है। वादा यह था कि दो करोड़ नौकरियां पैदा की जाएंगी पर नोटबंदी लागू करके 30 लाख नौकरियां एक झटके में खत्म कर दी। उसके बाद किसी भी सेक्टर में नौकरियां पैदा नहीं हुई है। मनमोहन सिंह के जमाने में कम से कम सर्विस सेक्टर में तो बहुत विस्तार हुआ था। महिलाओं को घर चलाना मुश्किल हो गया है। वह ख्वाब टूट चुका है।
मैं 2019 में यह परिदृश्य देखता हूं कि जनता का एक बड़ा हिस्सा विपक्ष को एकुजट होने के लिए मजबूर करेगा। कर्नाटक चुनाव इसकी बानगी है। करीब आना कोई नहीं चाहता था लेकिन, दोनों को आना पड़ा। मुझे लगता है 2019 से पहले ही अवाम विपक्षियों को एक साथ आकर भाजपा को टक्कर देने पर मजबूर करेगा। जिस तरह मुर्गियों, बकरियों को लाठी से हांककर इकट्‌ठा किया जाता है, उसी प्रकार जनता ने इन दलों को उपचुनावों में इकट्‌ठा होने पर मजबूर किया है। यह ऐसा ऐतिहासिक मोड़ है, जहां राजनीतिक चेतना के स्तर पर जनता, राजनीतिक दलों से आगे चल रही है। हमें अपेक्षा रहती है कि राजनीतिक पार्टियां नेतृत्व देंगी और जनता की चेतना को ढालेंगी। किंतु भारत के इतिहास में यह ऐसा मोड़ है कि जहां जनता की चेतना राजनीतिक दलों को दिशा दे रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Gauhar Raza analysis under Bhaskar Mahabharat 2019
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पेशे से वैज्ञानिक गौहर रजा उर्दू के मशहूर कवि, सामाजिक कार्यकर्ता और डॉक्यूमेंट्री मेकर हैं।पेशे से वैज्ञानिक गौहर रजा उर्दू के मशहूर कवि, सामाजिक कार्यकर्ता और डॉक्यूमेंट्री मेकर हैं।
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