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डाउनलोड करेंअबोहर (अमृतसर). विपिन शर्मा 10वीं तक पढ़े हैं और लंबे समय से दूध बेचकर अपने और परिवार का गुजारा कर रहे हैं। लेकिन एक वाकये ने उनकी जिंदगी बदल दी। इसी का सहारा लेकर उन्होंने 4,000 से ज्यादा दिव्यांगों का जीवन बदल दिया। दरअसल, विपिन 7 जुलाई 2015 को परिवार के दिव्यांग मयंक का प्रमाण-पत्र बनवाने संबंधित दफ्तर गए थे। वहां की कागजी प्रक्रिया, टालमटोल, भागदौड़ और इसमें दिव्यांगों को होने वाली परेशानी ने उन्हें भी परेशान कर दिया। उसी दौरान उन्होंने दिव्यांगों की मदद करने की ठानी और उसे ही जीवन का लक्ष्य बना लिया। 3500 से ज्यादा दिव्यांगों के लिए बनवाए पास...
- वे पिछले 3 साल में चार हजार से ज्यादा दिव्यांगों के प्रमाण-पत्र बनवा चुके हैं, जबकि 3500 से ज्यादा दिव्यांगों के लिए ट्रेन या बस पास बनवा दिए हैं।
- दिव्यांगों को उनका हक दिलवाने के लिए वे उन्हें नि:शुल्क फॉर्म उपलब्ध करवाने से लेकर मेडिकल जांच व वेरिफिकेशन तक हरसंभव मदद करते हैं।
- इस काम में उनकी 13 वर्षीय बेटी जाह्नवी व भतीजियां गुंजन और काजल भी सहयोग करती हैं।
कठिन से सामान्य हो गया जीवन
- इसी का असर है कि कई दिव्यांगों को स्कूल, अस्पताल, एक्साइज विभाग और अन्य जगहों पर सरकारी नौकरी पाने में मदद मिली है।
- ऐसे ही दो शख्स प्रवेश कुमार को सरकारी स्कूल में, जबकि तरसेम कुमार को एक्साइज विभाग में नौकरी मिली है। एक अन्य व्यक्ति सोपत राम भी हैं। विपिन शर्मा ने इनका और दो अन्य बच्चियों का प्रमाण-पत्र बनवाया।
- साेपत राम बताते हैं, ‘नाटे कद और चलने-फिरने में दिक्कत के कारण मुझे मामूली कामों के लिए भी सामान्य से ज्यादा परिश्रम करना पड़ता था। यदि विपिन शर्मा न होते, तो जीवन सामान्य से कठिन ही रहता।’
13 साल की बेटी और भतीजियां भी करती हैं मदद
- विपिन शर्मा सुबह और शाम साइकिल पर दूध बेचते हैं। इसके बाद बचे हुए समय का इस्तेमाल वे दिव्यांगों के प्रमाण-पत्र बनवाने के लिए फॉर्म भरने और उनकी फाइलें तैयार करने में इस्तेमाल करते हैं।
- उनका कहना है कि दूध बेचने के बाद उनके पास काफी समय होता है। इस दौरान वे दिव्यांगों की फाइलें तैयार करते हैं। इसके अलावा वे सहायता के लिए आने वाले दिव्यांगों को साथ लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर भी लगाते हैं।
मूक-बधिरों के डॉक्टरों की कमी पूरी करने में जुटे
- विपिन शर्मा अब सरकारी अस्पताल में ईएनटी डॉक्टरों की कमी पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ताकि मूक-बधिरों को मदद मिल सके। इसके लिए वे राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक अपनी बात और उद्देश्य पहुंचा रहे हैं।
- वे बताते हैं कि अस्पताल में ईएनटी डॉक्टरों की कमी है। इस वजह से मूक-बधिरों के प्रमाण-पत्र नहीं बन पा रहे हैं। इनमें 250 से ज्यादा अकेले अबोहर क्षेत्र के हैं प्रमाण-पत्र न बनने से उन्हें सरकारी सुविधाएं पाने में भी परेशानी हो रही है।
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