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कर्मचारियों के विरोध के बाद गूगल ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर बनाई पॉलिसी, जानें क्या होता है एआई सिस्टम और क्यों है ये खतरनाक?

सुंदर पिचाई ने साफ कहा है कि उनकी कंपनी ऐसी किसी टेक्नोलॉजी पर काम नहीं करेगी, जो लोगों को नुकसान पहुंचाए।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Jun 09, 2018, 01:46 PM IST

  • कर्मचारियों के विरोध के बाद गूगल ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर बनाई पॉलिसी, जानें क्या होता है एआई सिस्टम और क्यों है ये खतरनाक?
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    गैजेट डेस्क। अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन के आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस प्रोजेक्ट 'मेवेन' में शामिल होने के बाद गूगल के 4 हजार कर्मचारियों ने हस्ताक्षर कर कंपनी से नई पॉलिसी बनाने की मांग की थी, जिसके बाद कंपनी ने एआई को लेकर नई पॉलिसी बनाई है। सीईओ सुंदर पिचाई ने कहा है कि उनकी कंपनी ऐसी किसी टेक्नोलॉजी पर काम नहीं करेगी, जो लोगों के लिए नुकसानदायक हो। उन्होंने एक ब्लॉग पोस्ट कर लिखा कि हम एआई की ऐसी किसी डिजाइन पर काम नहीं करेंगे, जिसका इस्तेमाल हथियारों में होता हो या जिसका मकसद लोगों को नुकसान पहुंचाना हो। गूगल के इस विवाद के बाद एक बार फिर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल पर बहस छिड़ गई है। इसीलिए आज हम आपको आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बारे में वो सब बातें बताने जा रहे हैं, जिसे जानना जरूरी है।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर गूगल की पॉलिसी

    1. ऐसे हथियार या ऐसी टेक्नोलॉजी के कंपनी कोई काम नहीं करेगी जिसका मकसद लोगों को नुकसान पहुंचाना हो।
    2. ऐसी टेक्नोलॉजी पर कंपनी काम नहीं करेगी जिससे अंतर्राष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन करते हुए सर्विलांस के लिए सूचनाएं जुटाई जाएं।
    3. ऐसी टेक्नोलॉजी जिसका मकसद अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकार के खिलाफ हो, उससे भी गूगल दूर रहेगी।
    4. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस्तेमाल में देशों की संस्कृति, सामाजिक मान्यताओं और कानूनों का सम्मान किया जाएगा।
    5. कोशिश होगी कि नस्ल, जाति, लिंग, राष्ट्रीयता, इनकम, स्त्री-पुरुष भेद और राजनीतिक-धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ इसका इस्तेमाल न हो।

    क्या है पेंटागन-गूगल का मेवन प्रोजेक्ट?

    - अप्रैल 2017 में अमेरिकी रक्षा विभाग और गूगल के बीच एक प्रोजेक्ट को लेकर सहमति बनी थी और इसी प्रोजेक्ट को 'मेवन' नाम दिया गया था।
    - इस प्रोजेक्ट के तहत गूगल पेंटागन को ऐसी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग टेक्नोलॉजी देनी वाली थी, जिसके जरिए फोटो से ही किसी भी शख्स की पहचान की जा सकती थी।
    - इस प्रोजेक्ट का इस्तेमाल अमेरिकी सेना युद्ध के समय और खतरनाक आतंकियों की लोकेशन का पता लगाने के लिए करती।
    - गूगल की इस टेक्नोलॉजी के जरिए किसी भी फुटेज के जरिए उस शख्स की पहचान और लोकेशन के बारे में पता चल सकता था।
    - इस टेक्नोलॉजी के जरिए जैसे ही अमेरिकी सेना या पुलिस किसी संदिग्ध की फोटो डालती तो सॉफ्टवेयर के जरिए उसकी लोकेशन पता चल जाती।
    - इस प्रोजेक्ट के जरिए गूगल को हर साल 250 मिलियन डॉलर की कमाई होने का अनुमान था।
    - ये प्रोजेक्ट 2019 में खत्म हो रहा था, लेकिन उससे पहले ही मार्च 2018 में गूगल ने गुपचुप तरीके से इस प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए एग्रीमेंट को आगे बढ़ाने का फैसला लिया।
    - लेकिन गूगल के कर्मचारियों ने ही इस प्रोजेक्ट का विरोध कर दिया। दरअसल, कर्मचारियों का कहना था कि वो कभी ऐसी टेक्नोलॉजी पर काम नहीं करेंगे, जिसका इस्तेमाल युद्ध के लिए किया जाएगा। इसलिए कंपनी के 4,000 से ज्यादा कर्मचारियों ने हस्ताक्षर कर कंपनी से नई पॉलिसी बनाने की मांग की, जिसके बाद कंपनी ने इस प्रोजेक्ट से हटने का फैसला लिया।

    गूगल से ही क्यों मदद ली पेंटागन ने?

    - दरअसल, गूगल अब सिर्फ एक सर्च इंजन कंपनी बनकर नहीं रह गई है, बल्कि वो दुनिया की बेस्ट टेक्नोलॉजी कंपनी है।
    - गूगल अब अपनी टेक्नोलॉजी को बढ़ा रही है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर पिछले कई सालों से काम कर रही है।
    - गूगल की एआई टेक्नोलॉजी को गूगल असिस्टेंट के नाम से जाना जाता है। अमेरिकी सेना भी इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना चाहती है।
    - अमेरिकी सेना इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अब सिक्योरिटी और युद्ध के लिए करना चाहती है और इसके लिए ही उसने गूगल से एग्रीमेंट किया था।

    क्या होता है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस?

    - आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का अर्थ है कृत्रिम तरीके से विकसित की गई बौद्धिक क्षमता। दरअसल, इसके जरिए मशीनों को इस तरह से बनाने की कोशिश की जा रही है, जिससे वो इंसानों के सारे काम आसानी से कर सकें।
    - इन मशीनों को इस तरह से डिजाइन किया जा रहा है कि ये इंसानों की तरह फैसले लेने, सही-गलत की पहचान करे, इंसानों को पहचानने जैसे वो सारे काम कर सके जो इंसान करते हैं।
    - अगर सरल भाषा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को डिफाइन किया जाए तो इसका मतलब ये होता है कि ऐसी मशीनें तैयार करना जिनके पास इंसानों जैसा दिमाग हो और वो इंसानों की तरह ही काम कर सकें।

    कैसे पहचानें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मशीनें?

    - अगर कोई मशीने इंसानों की तरह काम करें, उनके साथ कोई गेम खेलें या फिर इंसानों की तरह बिहेव करें तो ऐसी मशीनें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी पर काम करती हैं।
    - आजकल ड्राइवरलैस गाड़ियों को बनाया जा रहा है, ये भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी का ही उदाहरण है।
    - अभी कई ऐसी मशीनें भी होती हैं जो इंसानों की तरह बिहेव करती हैं और कई काम करती हैं या फिर इंसानों से बातें करती हैं, लेकिन इस तरह की मशीनें उतना ही काम करती हैं जितना उनको कहा जाता है। ऐसी मशीनें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मशीन नहीं कहा जाता।

    कैसे आया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस?

    - कहा जाता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द अमेरिकी साइंटिस्ट जॉन मैकॉर्थी ने किया था। उन्होंने 1955 में अपने साथी मार्विन मिन्स्क, हर्बर्ट साइमन और एलेन नेवेल के साथ मिलकर इस टेक्नोलॉजी पर रिसर्च का काम शुरू किया था।
    - इसके बाद 1956 में डार्टमाउथ कॉलेज में जॉन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर एक वर्कशॉप भी रखी थी। हालांकि उस वक्त इतनी टेक्नोलॉजी नहीं थी कि इसपर काम किया जा सके।
    - जॉन मैकॉर्थी ने 1956 में इस टेक्नोलॉजी पर काम करना शुरू किया था और आज भी इस पर दुनियाभर के साइंटिस्ट इसपर काम कर रहे हैं।

    एआई टेक्नोलॉजी पर काम करने वाले रोबोट बन रहे हैं

    - आजकल रोबोटिक्स में भी काफी नए-नए इन्वेंशन हो रहे हैं और दुनिया की हर छोटी-बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनी रोबोटिक्स पर काम कर रही है।
    - आजकल रोबोटिक्स में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया जा रहा है। ये रोबोट इंसानों की तरह ही बात करते हैं और इंसानों की तरह ही फेशियल एक्सप्रेशन बनाते हैं। हालांकि इनके अंदर इंसानों की तरह फीलिंग नहीं होती है और इस पर भी रिसर्च की जा रही है।
    - साल 2016 में सोफिया नाम का एक रोबोट बनाया गया था, ये रोबोट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी का बेहतरीन उदाहरण है। सोफिया रोबोट इंसानों से आसानी से बातचीत कर लेता है, साथ ही अभी तक कई सारे इंटरव्यू भी दे चुका है।
    - इसके अलावा आजकल स्मार्टफोन में भी एआई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से क्या होगा नुकसान?

    - एक्सपर्ट का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी पर काम करने वाले रोबोट्स या मशीनें अगर किसी कारण से इंसानों को अपना दुश्मन मानने लगे तो ये इंसानों के लिए खतरा हो सकते हैं।
    - इसके अलावा एआई टेक्नोलॉजी पर काम करने वाली मशीनें इंसानों से ज्यादा स्मार्ट होती हैं और वो सारे काम कर सकती हैं जो इंसान कर रहे हैं। ऐसे में अगर इस्तेमाल होने लगा तो इंसानों के हाथ से काम चला जाएगा और दुनियाभर में बेरोजगारी और गरीबी बढ़ जाएगी।
    - इसका सबसे ज्यादा असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा, क्योंकि जब मशीनें ही सारा काम करने लगेंगी और इंसान घर पर बैठेंगे तो ये मशीनें प्रोडक्ट्स तो बना लेंगी लेकिन इन्हें खरीदा नहीं जा सकेगा।
    - एक्सपर्ट का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी के बारे में सोचना और उसपर काम करना अच्छा हो सकता है, लेकिन भविष्य में इंसानों के लिए ही खतरनाक साबित हो सकते हैं। क्योंकि इनमें इंसानों की तरह ही सोचने-समझने की क्षमता होगी और जब सबकुछ इनके कंट्रोल में होगा तो ये हमें नुकसान पहुंचा सकते हैं।
    - पिछले साल एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि फेसबुक ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर काम करना बंद कर दिया है। दरअसल, एआई सिस्टम ने इंग्लिश का इस्तेमाल बंद कर आपस में बातचीत करने के लिए अपनी अलग भाषा इजाद कर ली थी और इससे एक-दूसरे को मैसेज भेजने लगे थे।
    - महान साइंटिस्ट स्टीफन हॉकिंग का भी कहना था कि एआई सिस्टम पर अगर कंट्रोल नहीं रहा तो ये मानव जाति के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है। उनका मानना था कि अगर इसे बिना रोकटोक के आगे बढ़ने दिया गया तो इससे मानव जाति ही खत्म हो जाएगी।

  • कर्मचारियों के विरोध के बाद गूगल ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर बनाई पॉलिसी, जानें क्या होता है एआई सिस्टम और क्यों है ये खतरनाक?
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