पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर
डाउनलोड करेंरोहन राय
बीबीसी संवाददाता
सुबह के 5.30 बजे हैं. पहलवान वीरेंद्र छत्रसाल स्टेडियम के अखाड़े में अपने प्रतिद्वंद्वी को कभी पटखनी देते हैं तो कभी धोबी पछाड़.
अब आप कहंगे कि अगर वीरेंद्र पहलवान हैं तो ज़ाहिर है कि अखाड़े में वो ये सब करते ही नज़र आएंगे. लेकिन वीरेंद्र बाकी पहलवानों से ज़रा अलग हैं.
वीरेंद्र सुन बोल नहीं सकते. उन्हें गूंगा पहलवान के नाम से बुलाया जाता है.
लेकिन गूंगा पहलवान ने अपनी इस अक्षमता को कभी अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया. वो एक विश्व स्तरीय खिलाड़ी हैं. वीरेंद्र उर्फ गूंगा, 2005 मेलबोर्न डेफलंपिक्स में स्वर्ण पदक और 2009 तायपेई डेफलंपिक्स में कांस्य पदक जीत चुके हैं. इसके अलावा 2008 और 2012 वर्ल्ड डेफ रेसलिंग चैंपियनशिप (बधिरों की विश्व कुश्ती चैंपियनशिप) में भी वीरेंद्र रजत और कांस्य पदक जीत चुके हैं.
जब बीबीसी ने वीरेंद्र से मुलाक़ात की उस वक्त उनके इंटरप्रेटर भी उनके साथ मौजूद थे. उनकी मदद से गूंगा पहलवान बताते हैं कि उनके पिता की पहल पर उन्होंने पहलवानी की शुरूआत की.
कैसे हुई शुरुआत
बचपन में वीरेंद्र अपने घर के आंगन में बैठे हुए थे जब बाहर से आते हुए उनके रिश्तेदार ने देखा कि उन्हें पैर में दाद हुआ है. उसी का इलाज कराने वो उन्हें दिल्ली ले आए जहां से उनकी कुश्ती की शुरुआत हुई. हालांकि वीरेंद्र ख़ुद कहते हैं कि उन्हें पहलवानी का शौक घर के पास वाले अखाड़े से लगा जहां उनके पिता अजित सिंह भी पहलवानी करते थे.
नहीं मिली सरकारी मदद
2002 में गूंगा ने दंगल लड़ने शुरू किए और फिर आगे बढ़ते-बढ़ते कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कामयाबी हासिल की.
लेकिन इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद इन्हें अब तक सरकार से ज्यादा कुछ नहीं मिला. तब हताश और निराश वीरेंद्र को उनके पिताजी 2011 में दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम ले आए. यहाँ कोच रामफल मान ने उन्हें ट्रेनिंग देनी शुरु की.
रामफल कहते हैं, \"वीरेंद्र बहुत अनुशासित पहलवान हैं और मैं तो कहता हूं कि आम पहलवानों के मुक़ाबले इसमें ज्यादा दिमाग है. ये कामयाबी पाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करते हैं.\"
आगे की राह
गूंगा अब 2013 बुलगारिया डेफलंपिक्स में हिस्सा लेने सोफ़िया जा रहे हैं जहां वो 74 किलोग्राम की श्रेणी में खेलेंगे. हालांकि अब तक सरकार से इन्हें ज्यादा कुछ नहीं मिला हैं लेकिन अब खेल नीति में बदलाव के तहत अगर गूंगा मैडल जीतते हैं तो उन्हें दूसरे खिलाड़ियों के बराबर ही पैसा मिलेगा.
बीबीसी जब गूंगा पहलवान से मिली तो उस वक्त उनके इंटरप्रेटर भी उनके साथ थे जिनकी मदद से गूंगा पहलवान ने हमें बताया कि वो इस बदलाव से खुश हैं.
वो आगे कहते हैं, \"मैं खुश तो हूं लेकिन दबाव में भी हूं क्योंकि पापा के मुझे लेकर काफी अरमान हैं. लेकिन मुझे खुद पर भरोसा है. मैं जीतकर ही आऊँगा .\"
गूंगा की ज़िंदगी पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म भी बन रही है जिसका नाम है गूंगा पहलवान. इस फिल्म का निर्देशन कर रहे हैं विवेक चौधरी, मीत जानी और प्रतीक गुप्ता.
Copyright © 2021-22 DB Corp ltd., All Rights Reserved
This website follows the DNPA Code of Ethics.