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युधिष्ठिर ने कैसे किया दुर्योधन को युद्ध के लिए तैयार?

गांधारी नंदन उठो तो सही एक-एक के साथ ही गदायुद्ध करके अपने पुरुषत्व का परिचय दो।

Danik Bhaskar | Oct 25, 2012, 04:07 PM IST

रिलिजन डेस्क. महाभारत में अब तक आपने पढ़ा....दुर्योधन बोला महाराज युधिष्ठिर प्राणों का भय तो किसी को भी हो सकता है। लेकिन मैं प्राणों के भय से यहां नहीं आया हूं। मेरे पास रथ नहीं है न थ। मेरे सारथि भी मारे जा चुके हैं। सेना भी नष्ट हो गई। इस दशा में मेरी थोड़ी देर विश्राम करने की इच्छा हुई। मैंने थकने के कारण ऐसा किया है तुम भी कर सकते हो। जिन भाइयों के लिए मैं राज्य चाहता था अब वही नहीं रहे। समस्त पृथ्वी श्रत्रियहीन व श्रीहीन हो गई है। लेकिन मैं पांडवों और पांचालों का उत्साह भंग करने के लिए तुमसे युद्ध करना चाहता हूं। आज से यह सारी पृथ्वी तुम्हारी हुई मैं इसे नहीं चाहता अब आगे....
युधिष्ठिर ने कहा गांधारी नंदन उठो तो सही एक-एक के साथ ही गदायुद्ध करके अपने पुरुषत्व का परिचय दो। महाराज युधिष्ठिर के इस कथन को दुर्योधन नहीं सह सका। उसे बहुत क्रोध हुआ। वह हाथ में गदा लिए खड़ा हुआ। युधिष्ठिर बोले दुर्योधन जिस समय बहुत से महारथियों ने मिलकर अकेले अभिमन्यु को मार डाला। उस समय तुम्हे न्याय व अन्याय की बात सुझी। यदि तुम्हारा धर्म यही कहता हैं कि बहुत से योद्धा मिलककर एक को न मारें तो उस दिन तुमने अभिमन्यु को क्यों मार डाला। सच है स्वयं पर जब संकट आता है तो अक्सर लोग धर्म पर विचार नहीं करते।
लेकिन सुनों मैं तुम्हे वरदान देता हूं तुम पांचों पांडव में से जिससे भी चाहो उससे युद्ध करो यदि जिसके साथ तुम युद्ध करोगे और उसे मार डालोगे तो राज्य तुम्हारा ही होगा और खुद मारे गए तो तुम्हारे लिए स्वर्ग तो है ही। इसके अतिरिक्त भी बताओ, हम तुम्हारा कौन सा प्रियकार्य करें। उसके बाद दुर्योधन ने सोने कवच और सुनहरा टोप-ये दो चीजें मांग ली और धारण भी कर लिए। फिर वह गदा हाथ में लिए बोला मैं जानता हूं गदा युद्ध में मुझसे बेहतर कोई नहीं है। इसीलिए तुम में से कोई भी मुझसे गदा युद्ध कर सकता है।

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