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हामिद मीर का कॉलम: इमरान के लिए गलतियों की गुंजाइश नहीं

संद्रभ:विपक्ष की गलतियों से सत्ता मिली है, अच्छे शासन से जनसमर्थन जुटाकर ही वे सत्ता बनाए रख सकेंगे

Danik Bhaskar | Aug 09, 2018, 12:07 AM IST

‘क्या आपको याद है कि मैं कैसे अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई और क्या आपको मेरे संघर्ष के दिन याद है?’ इमरान खान ने मुझसे यह प्रश्न उस मुलाकात की शुरुआत में पूछे जो हाल की उनकी जीत के बाद हुई। यह बानी गाला में सिर्फ के एक कॉफी मीटिंग थी। वहां काफी बदलाव आ गया था। मुझे ऑफिस के गेट पर फोन जमा करने को कहा गया। पिछले दो दशकों में ऐसा कभी नहीं हुआ। अचानक अहसास हुआ कि मैं पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री से मिलने जा रहा हूं। यह नए प्रधानमंत्री का वीकेंड पर कैम्प ऑफिस बन जाएगा, क्योंकि इमरान वीकेंड तो प्रधानमंत्री आवास में गुजारने से रहे।


इमरान मुझे तनावमुक्त चेहरे के साथ मिले। वे जब अपने सामने मौजूद बड़ी चुनौतियों की बात कर रहे थे तब भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी। अब वे नवाज शरीफ या आसिफ जरदारी के खिलाफ बातें नहीं कर रहे थे। वे ऊर्जा संकट, पानी की कमी और कर्ज की समस्या की बातें कर रहे थे। जब मैंने कहा कि समस्याएं बड़ी है और असेंबली में विपक्ष भी बड़ा है तो कहने लगे, ‘कई लोग कहा करते थे कि इमरान खान प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। अब वही लोग कह रहे हैं कि इमरान समस्याएं नहीं सुलझा सकते लेकिन, मैं इन समस्याओं को मात दूंगा।’


उन्होंने मुझे यह कहकर चौंका दिया कि वे बलूच नेता अख्तर मेंगल को मिलने को तैयार हैं और उनकी छह मांगों का समर्थन करेंगे। बलूचिस्तान नेशनल पार्टी की पहली मांग ही लापता लोगों के बारे में है। वे सारे लापता लोगों को अदालत में पेश करने की मांग कर रहे हैं। नेशनल असेंबली में उनकी सिर्फ तीन सीटें हैं और इमरान इन मांगों का समर्थन सिर्फ तीन वोटों के लिए नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘मैंने अख्तर मेंगल की मांगों का 2012 में समर्थन किया और अब प्रधानमंत्री के रूप में मैं इन पर ध्यान देने की कोशिश करूंगा।’ यह उन सारे लोगों को एक संदेश है, जो सोचते हैं कि वे ताकतवर फौज की कठपुतली बन जाएंगे। फौज तो कभी मेंगल जैसे लोगों को असेंबली में देखना ही नहीं चाहती। इमरान ने 2003 में मेरे शो में ही डॉ. आफिया सिद्दीकी के लापता होने की स्टोरी ब्रेक की थी और आफिया अब अमेरिका में सलाखों के पीछे है। अब वे इस पर चुप नहीं रह सकते। लापता लोगों का मामला आतंकवाद के खिलाफ युद्ध से सीधे जुड़ा है। आतंकियों से संबंधों के शक में बड़ी संख्या में लोगों को उठा लिया गया, जबकि इमरान कहते रहे हैं कि यह हमारा नहीं, अमेरिका युद्ध है। हमें अपने लोगों से नहीं लड़ना चाहिए।’ इस पर कई आलोचकों ने उन्हें ‘तालिबान खान’ कहा। 2005 में तो मेरे एक शो में परवेज मुशर्रफ के सूचना मंत्री शेख अहमद ने उन्हें मुंह पर ‘दो टके का कैप्टन’ कहा था। आज वही शेख उनके सहयोगी हैं।


कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि इमरान ने बहुत संघर्ष किया है और कभी शॉर्ट कट नहीं अपनाया। 1988 में जिया उल हक ने उन्हें मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया था। 1993 में मोईन कुरैशी की कार्यवाहक सरकार में फिर प्रस्ताव मिला, उन्होंने ठुकरा दिया। 1996 में उन्होंने अपनी पार्टी बनाई तो मैं भी उन लोगों में था, जो उनके राजनीति में उतरने के खिलाफ थे। नवाज शरीफ ने 1997 में उन्हें 20 नेशनल असेंबली सीटों का प्रस्ताव दिया पर उन्होंने इनकार कर दिया। 1997 में पहला चुनाव लड़ा और हर जगह बुरी हार हुई। 2002 के चुनाव के पहले परवेज मुशर्रफ ने पीएमएल-क्यू के साथ गठजोड़ के लिए दबाव डाला पर उन्होंने इनकार कर दिया। उस चुनाव में उनकी पीटीआई पार्टी को एक सीट मिली। अगले सात साल तक इमरान ही थे, जिन्होंने जनरल मुशर्रफ की नीतियों का असेंबली के भीतर-बाहर विरोध किया। तब बेनजीर व नवाज शरीफ विदेश में निर्वासित थे। उन्होंने वकीलों के आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई, मीडिया पर पाबंदियों का विरोध किया। जब मुशर्रफ ने मुझ पर टीवी पर आने पर पाबंदी लगाई तो वे मेरे रोड शो में शामिल हुए। उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया पर उन्होंने मुशर्रफ से कभी सौदा नहीं किया। 2007 में बेनजीर की हत्या के बाद मुशर्रफ की सत्ता में उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया।


लेकिन पहले पीपीपी और फिर पीएमएल-एन ने चुनाव लड़ने का फैसला लिया और गठबंधन सरकार बना ली। फिर तो दोनों पार्टियां इमरान के निशाने पर आ गई। इसी वक्त पंजाब व खैबर पख्तूनख्वां के वोटर पीटीआई की ओर आने लगे। ये वही दिन थे जब अमेरिका के ड्रोन हमले बढ़ रहे थे। इमरान ही एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने ड्रोन हमलों के खिलाफ आंदोलन किए। उनके अमेरिका विरोध ने उन्हें क्रोधित युवाओं का हीरो बना दिया। 2013 के चुनाव में वे तीसरी राजनीतिक ताकत बनकर उभरे। विदेश नीति की बड़ी चुनौतियों को छूने के पहले उन्हें सरकार में भरोसेमंद लोगों को लेकर विश्वसनीयता स्थापित करनी होगी। उनके शुभचिंतकों की आशंकाओं के बावजूद वे सत्ता प्रतिष्ठानों से टकराव मोल नहीं लेंगे पर वे किसी का डिक्टेशन नहीं लेंगे। चुनाव बाद के भाषण के बारे में उन्होंने मुझसे पूछा तो मैंने कहा, ‘आपकी विनम्रता सकारात्मक मुद्रा थी।’ हमने भारतीय फिल्म सितारे आमिर खान के शपथ समारोह में न आने की चर्चा की। मैं अनुमान लगाया कि वे व्यस्त तो नहीं है, शायद उन पर दबाव हो। इमरान सिर्फ मुस्करा दिए। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कॉल की चर्चा में उन्होंने कहा कि मोदी ने कश्मीर का कोई उल्लेख नहीं किया पर मैं इस मुद्‌दे को लेकर प्रतिबद्ध हूं।


इमरान को मिसाल रखनी होगी कि कानून सबके लिए समान है। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें हेलिकॉप्टर मामले में राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो (एनएबी) के सामने पेश होना चाहिए। इससे वे दुनिया को नए पाकिस्तान का युग शुरू होने का संकेत दे सकेंगे। इमरान को अहसास होना चाहिए कि वे अपने घोषणा-पत्र पर नहीं जीते है बल्कि विपक्षियों की महाभूलों के कारण ऐसा हुआ है। अब विरोधी उनकी गलतियों का इंतजार कर रहे हैं। तब विपक्ष एकजुट होकर इस्लामाबाद की ओर कूच कर देगा। इमरान जनसमर्थन के बिना अपनी सरकार का बचाव नहीं कर पाएंगे। जनहितैषी नीतियों के जरिये उन्हें अधिक जनसमर्थन जुटाने की जरूरत है।


हामिद मीर
एग्ज़ीक्यूटिव एडिटर,
जियो टीवी पाकिस्तान

(लेखक के अपने विचार हैं।)