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हनुमान जी की आरती: जानिए पूरी विधि और सावधानियां

3 वर्ष पहले
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भगवान हनुमान हिंदू धर्म में पूजे जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक हैं। हनुमान जी को भगवान राम के परम भक्त के रूप में जाना जाता है इसलिए इन्हें भक्त हनुमान कहा जाता है। हनुमान जी हिंदू महाकाव्य रामायण के केंद्र पात्रों में प्रमुख है। ये अष्टचिरंजीवियों में से भी एक हैं। यानी अमर हैं। भगवान हनुमान का जन्म हिन्दू पंचांग के चैत्र माह की पूर्णिमा पर चित्रा नक्षत्र और मंगलवार को मेष लग्न में हुआ था। हनुमान जी की माता अंजना और पिता का नाम केसरी था। इसलिए इन्हें अंजनी पुत्र और केसरी नंदन कहा जाता है। कुछ ग्रंथों में इन्हे वायुपुत्र भी कहा गया है।

हनुमान जी की पूजा से हर तरह का संकट दूर हो जाता है। इसलिए इन्हे संकट मोचन कहा गया है। इनकी पूजा से हर तरह की परेशानियां, रोग, डर, मुश्किलें दूर हो जाती हैं। कोर्ट-कचहरी के मामले और अन्य विवादों में जीत के लिए लोग हनुमान जी की पूजा और आरती करते हैं। इससे बुरी ताकतें भी दूर रहती हैं। हनुमान जी की आरती सुबह-शाम दोनों समय करनी चाहिए, लेकिन ऐसा न कर पाएं तो संध्या समय अच्छा माना गया है। यानी जब दिन खत्म हो रहा हो और रात शुरू हो रही हो। इस समय हनुमान जी की आरती करने से मनोकामना पूरी होती है।

कैसे करें आरती -  

आरती शुरू करने से पहले 3 बार शंख बजाएं। शंख बजाते समय मुंह उपर की तरफ रखें। शंख को धीमे स्वर में शुरू करते हुए धीरे-धीरे बढ़ाएं। इसके बाद आरती शुरू करें। आरती करते हुए ताली बजाएं। घंटी एक लय में बजाएं और आरती भी सूर और लय का ध्यान रखते हुए गाएं। इसके साथ ही झांझ, मझीरा, तबला, हारमोनियम आदी वाद्य यंत्र बजाएं। आरती गाते समय शुद्ध उच्चरण करें। आरती के लिए शुद्ध कपास यानी रूई से बनी घी की बत्ती होनी चाहिए। तेल की बत्ती का उपयोग करने से बचना चाहिए। कपूर आरती भी की जाती है।  बत्तियाें की संख्या एक, पांच, नौ, ग्यारह या इक्किस हो सकती है। आरती घड़ी के कांटो की दिशा में लयबद्ध तरीके से करनी चाहिए।

आरती शुरू करने से पहले ये मंत्र बोलें - 

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्

दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् |

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्

रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ||

अर्थ – अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीर वाले, दैत्य रूपी वन (को ध्वंस करने) के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, संपूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्री रघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान्‌जी को मैं प्रणाम करता हूँ॥

 

हनुमान जी की आरती -

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥

जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके॥

अंजनि पुत्र महा बलदाई। सन्तन के प्रभु सदा सहाई॥

दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए॥

लंका सो कोट समुद्र-सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥

लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज सवारे॥

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि संजीवन प्राण उबारे॥

पैठि पाताल तोरि जम-कारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥

बाएं भुजा असुरदल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे॥

सुर नर मुनि आरती उतारें। जय जय जय हनुमान उचारें॥

कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई॥

जो हनुमानजी की आरती गावे। बसि बैकुण्ठ परम पद पावे॥

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