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कहर और करिश्मे: लगातार आ रहे तूफानों के बीच पीड़ितों की वो कहानियां जो झकझोर देती हैं

3 वर्ष पहले
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नई दिल्ली. तूफान में कोई गंभीर घायल हुआ तो कई की दर्दनाक मौत हो गई। कुछ ऐसे करिश्मे भी हुए, जिनसे लोगों को नई जिंदगी मिली। दिसंबर 2004 के अंत में आई सुनामी के बाद दैनिक भास्कर ने अंडमान-निकोबार के आस-पास के इलाके में हुए कहर और करिश्मे भी बताए थे। इस बार पढ़िए उत्तर प्रदेश से रवि श्रीवास्तव  और राजस्थान से राधेश्याम तिवाड़ी  व प्रमोद कल्याण  की रिपोर्ट...

 

करिश्मा : पेड़ गिरा, लेकिन बाल भी बांका न हुआ इनका

 

अलवर शहर के सिविल अस्पताल के सामने शीशम के एक पुराने पेड़ के नीचे कई साल से यह विक्षिप्त डेरा डाले हुए है। बताया जाता है कि वह घर-परिवार से संपन्न है, लेकिन किन्ही कारणों से विक्षिप्त होकर अब इस पेड़ के नीचे ही बैठा रहता है। अकेलेपन में वह उस पेड़ से बातें भी करता रहता है। तूफान वाले दिन भी वह यहीं बैठा था कि अचानक हवा के झौंके से पेड़ दो टुकड़ों में यूं फट गया और बगल के टीबी अस्पताल की चारदीवारी पर तोड़ता हुआ धराशायी हो गया। 

 

कहर: पूरा परिवार खत्म हो गया, शादी के घर में मातम

 

बीती 13 मई को आए आंधी तूफान ने बाराबंकी के इस पूरे परिवार को खत्म कर दिया। हादसे में सुशीला, उनके पति राजू और 9 महीने की बेटू अपनी जान से हाथ धो बैठे। सुशीला के चचेरे भाई अमित ने बताया कि 12 मई को सुशीला के भाई अखिल की शादी थी, जिसमें शामिल होने के लिए परिवार एक दिन पहले ही रामनगर पहुंचा था। 13 मई की शाम उन्हें परिवार के साथ अपने घर सेमरा के लिए निकलना था। चूंकि मौसम खराब था तो सबने बहुत रोकने की कोशिश की लेकिन राजू को अगले दिन ड्यूटी पर जाना था।

 

ड्यूटी की वजह से बहन ने भी घरवालों की बात नहीं मानी और बाइक से चल दिए। पीछे बैग बंधा था और सुशीला बेटू को लेकर बैठी थी। रास्ते में आंधी-तूफान और बारिश इतनी तेज हो गई कि चलना मुश्किल हो गया। तूफान इतना तेज था कि एक पेड़ तीनों पर गिर गया। जिसमें दबकर तीनों की मौत हो गई। यह खबर जैसे ही सुशीला के मायके पहुंची तो शादी के घर की खुशियां मातम में बदल गईं। राजू के साढ़ू घनश्याम ने बताया कि एक घंटे बाद जब हमें सूचना मिली तो हम लोग मौके पर पहुंचे, जहां सुशीला और राजू की मौत हो चुकी थी। बच्ची बेहोश थी। डॉक्टर ने बच्ची को भी मृत घोषित कर दिया।

 

करिश्मा: मां-भाई गुजर गए, पिता जेल में, ऐसे बची मासूम

 

आगरा के खैरागढ़ की छह साल की मानवी हादसे में जिंदा बच गई है। मानवी की मां आत्महत्या कर चुकी है तो पिता इस समय जेल में हैं। 4 साल के भाई की भी हादसे में मौत हो चुकी है। दादी-दादा के पास रहने वाली मानवी 2 मई को मौत के मुंह से लौटी। हादसे में दादा-दादी भी घायल हुए। मानवी की नानी ने बताया कि मानवी दादा-दादी के साथ थी तभी तूफान की वजह से घर की छत ढह गई। मानवी लगभग एक घंटे तक मलबे में दबी रही। तूफान थमने पर जब गांववाले पहुंचे तब मानवी और उसके दादा-दादी को बाहर निकाला गया। मानवी के चेहरे पर चोट आई है। 

 

कहर: हवा ने उछाला, तीन साथी पिलर में दब गए

 

भरतपुर के गांव जनूथर का जितेंद्रसिंह एक पखवाड़े बाद भी सामान्य नहीं हो पाया है। उसकी आंखों में 2 मई को आई आंधी का खौफ समाया है। इसमें उसके 3 दोस्तों की मौत हो गई थी। तीनों पुलिस या सेना में जाने की तैयारी कर रहे थे। जितेंद्र, गब्बर, तनु, संजय, मोनू और कृष्ण मुरारी दौड़ लगाकर लौट रहे थे। तभी तेज आंधी आई तो काॅलेज गेट के सहारे खड़े हो गए। जितेंद्रसिंह ने बताया कि शुरुआत में आंधी को लेकर हंसी मजाक कर रहे थे, किंतु तूफान तेज होने लगा तो हम भयभीत हो गए। कुछ ही मिनटों में हवा का तेज झाेंका आया और मैं, मोनू और कृष्णमुरारी एक झटके में आगे की ओर झाड़ियों में उछल कर गिरे।

 

कुछ सेकंड बाद पिलर ढह गया। कुछ दिखाई और सुनाई नहीं दे रहा था। हमने आपस में एक-दूसरे को पकड़ लिया और रेंगते हुए आगे बढ़े। करीब 15 मिनट बाद जब बवंडर थोड़ा थमा तो हमने दोस्तों को आवाज लगाई, किंतु जवाब नहीं मिला। तभी बिजली कड़की और पिलर के नीचे दोस्तों को देख चीख निकल गई। शोर मचाकर लोगों को बुलाया, किंतु तब तक देर हो चुकी थी। हमारे तीन साथी गब्बर, तनु व संजय अब साथ नहीं हैं। गब्बर को इसी 15 मई को दिल्ली पुलिस में जॉइन करना था।

 

 

करिश्मा: कार के ऊपर पलट गया टैंकर, लेकिन बच गई जान 


आगरा के जौनई गांव के रहने वाले बलदेव और उनके बेटे सुदेश ने 2 मई को मौत को बहुत करीब से देखा है। बलदेव सिंह बताते हैं कि वो गांव से आगरा कैंट रेलवे स्टेशन के लिए निकले थे। गांव से डेढ़ से 2 किमी सड़क पर थे तभी तेज तूफान आ गया। उनकी गाड़ी धीमी हो गई। बगल से एक टैंकर जा रहा था। देखते ही देखते टैंकर उनकी कार पर पलट गया। एकदम से तो समझ ही नहीं आया क्या हो गया। अांखों के सामने अंधेरा छा गया। सुदेश चिल्लाने लगा लेकिन कोई हमारी सुनने वाला नहीं था। दबाव की वजह से कार के शीशे टूट गए थे। किसी तरह सामने की तरफ से हम बाहर निकले। काफी देर तक हम सड़क के किनारे दुबके रहे। हम लोगों को काफी चोट आ गई थी। सुदेश का पैर टूट गया था और मेरे सिर पर चोट लगी थी। जब तूफान शांत हुआ तो चोट भूलकर हम गांव में लौटे। 

 

जहां हाहाकार मचा हुआ था। मेरे घर का एक हिस्सा भी ढह गया था। फ़िलहाल हमें चार दिन पहले अस्पताल से छुट्टी मिली है। मुआवजा जो मिला उससे घर का काम शुरू करवाया है। लेकिन पूरी गाड़ी ध्वस्त हो गई। अभी वह कंपनी वाले ले गए हैं। 

 

कहर : 150 साल पुराना पीपल उखड़ गया, दब कर हुई मौत 
 

बरखेड़ा निवासी कल्याण सहाय का 27 वर्षीय पुत्र राकेश जांगिड भिवाड़ी में एक फैक्ट्री में काम करता था। साप्ताहिक अवकाश पर 2 मई को घर आया था। शाम को सब्जी लेने अलवर में घंटाघर के पास सब्जी मंडी पहुंचा और हादसे का शिकार हो गया। घटना के बारे में घटनास्थल से कुछ मीटर दूर सब्जी बेच रहे 72 वर्षीय रूपनारायण ने बताया कि तूफान से मंडी में भगदड़ सी मच गई थी। राकेश पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा हो गया। तभी जबरदस्त तेज हवा के झौके से भारी भरकम पीपल का पेड़ उखड़ गया। राकेश दब गया। वह करीब एक घंटे तक फंसा रहा। काफी मशक्कत के बाद पेड़ के नीचे से निकाल उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।