विज्ञापन

महाभारत-2019 भास्कर दृष्टि: समर्थन मूल्य बढ़ाए, किन्तु घट क्यों रही है अन्नदाता की प्रसन्नता? / महाभारत-2019 भास्कर दृष्टि: समर्थन मूल्य बढ़ाए, किन्तु घट क्यों रही है अन्नदाता की प्रसन्नता?

कल्पेश याग्निक

Jul 07, 2018, 11:16 PM IST

स्वयं कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट कह रही है कि आधे से ज्यादा किसान तो समर्थन मूल्य के बारे में जानते तक नहीं!

कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर क कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर क
  • comment
महाभारत में है कि पृथ्वी में शब्द, स्पर्श, रूप, गंध और रस ये पांचों तत्व हैं।
इस व्याख्या के वर्तमान अर्थ के अनुसार तो पृथ्वी से अन्न उगाने वाले कृषक को लाभ देने वाले को भी ये तत्व मिलेंगे। किन्तु उसके लिए छठा तत्व अर्थात् ‘मन’ लगाना होगा। और सातवां तत्व ‘बुद्धि’ भी। आठवां तत्व ‘अहंकार’ छोड़कर!
राजनीति पुन: किसानों की ओर मुड़ी है। किन्तु दारुण- दारिद्र्य झेल रहे किसानों को कुछ मिलता कहां है?
नरेन्द्र मोदी सरकार ने डेढ़ गुना समर्थन मूल्य घोषित कर दिया। नीति, नीयत, निर्णय के रूप में बहुत अच्छा, उचित, आवश्यक कार्य किया। किन्तु वास्तविकता, व्यवस्था, व्यवहार के रूप में बुहत कम किसानों को लाभ मिल सकेगा।
क्योंकि, कोई और नहीं, स्वयं कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट कह रही है कि आधे से ज्यादा किसान तो ‘समर्थन मूल्य’ के बारे में जानते तक नहीं हैं! स्पष्ट है, जानेंगे ही नहीं तो मूल्य पाएंगे कैसे?
उधर, कांग्रेस-निर्देशित कर्नाटक की कुमारस्वामी सरकार ने किसानों के ऋण माफ करने की घोषणा की है। वहां किसानों के त्रास को देखते हुए सहज, स्वस्थ, स्वाभाविक पहल है। किन्तु उत्तर प्रदेश का उदाहरण है। वहां योगी आदित्यनाथ सरकार ने सदाशयता के साथ ऋण-मुक्ति की थी। 100-100 रु. तक के ऋण माफ हुए। 20-25 हजार तो सर्वोच्च राशि थी। कर्नाटक में भी ऐसा ही होगा।
किन्तु किसानों को जितना दिया जाए, कम ही है। अंधेर, अनर्थ, अात्महत्या से घिरे किसान परिवारों को दोगुनी आमदनी का जो वचन दिया गया है - अभी तो उसका पालन होता कहीं नहीं दिखाई देता।
अर्थशास्त्री और विद्वान इनमें सर्वाधिक बड़ा रोड़ा है। वे तत्काल आंकड़ों का जाल खड़ा कर देते हैं। कि इससे इकोनॉमी नष्ट हो जाएगी। कृषि सुधारों से ही कुछ होगा। आदि। और राजनीति मान भी लेती है।
दुर्भाग्य तो यह है कि विपक्ष भी मीनमेख निकालने में लग जाता है।
समर्थन मूल्य को ही लें।
चूंकि अक्टूबर-नवंबर में ही खरीफ़ फसल काटने का समय होगा - जो राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ राज्यों में चुनाव का समय है। इसलिए विपक्ष इसे चुनावों से जोड़ कर देख रहा है।
तेलंगाना सरकार ने किसानों को लाभ देने के लिए प्रति एकड़ सब्सिडी का फॉर्मूला तैयार किया है। अब ग़ैर-भाजपा, ग़ैर-कांग्रेस विपक्षी एकता की बात कर रहे वहां के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के समर्थक चाहते हैं - समर्थन मूल्य का आधार बदलकर जो तयशुदा नियम बना दिए गए हैं - उससे असल लागत खर्च कभी सही नहीं निकलेगा। इसलिए सभी जगह तेलंगाना फाॅर्मूला लागू करना चाहिए।
फॉर्मूला क्या हो, यह उतना बड़ा प्रश्न नहीं है। राहुल गांधी उपहास उड़ाते हुए कहते रहे हैं कि ‘इधर से आलू डालो- उधर सोना निकलेगा; ऐसी मशीन मोदीजी लाएंगे!
जबकि, उनकी पार्टी क्या लाई थी? चुनाव से ठीक पहले 67 हजार करोड़ की ऋण-मुक्ति और दूसरी बार यही, धान का समर्थन मूल्य बढ़ाया था।
कोई राजनीति, कोई दल कुछ करता ही नहीं है। इस बार भी धान के समर्थन मूल्य को लें तो यह बढ़कर 1750 रुपए हुआ। जबकि स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों के मुताबिक यह प्रति क्विंटल 2340 रुपए होना चाहिए। तो कहां से खुश होगा किसान?
पैदावार बढ़ रही है। और भुगतान घट रहे हैं। पिछले खरीफ मौसम में आमदनी 4 फीसदी घट गई थी। इस बार बढ़ सकती है यदि लाभ पहुंचाने की कोई ठोस व्यवस्था बन सके।
यूं भी कई बाधाएं हैं। गेहूं-चावल की पैदावार अकेले तीन राज्यों- पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश में, देशभर से अधिक है यानी 56%। और राजनीति देखें तो भी ठीक है, क्योंकि समर्थन मूल्य का अधिक लाभ उन्हीं राज्यों को मिलेगा - जहां भाजपा को आवश्यकता है।

X
कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर ककल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर क
COMMENT
Astrology

Recommended

Click to listen..
विज्ञापन

किस पार्टी को मिलेंगी कितनी सीटें? अंदाज़ा लगाएँ और इनाम जीतें

  • पार्टी
  • 2019
  • 2014
336
60
147
  • Total
  • 0/543
  • 543
कॉन्टेस्ट में पार्टिसिपेट करने के लिए अपनी डिटेल्स भरें

पार्टिसिपेट करने के लिए धन्यवाद

Total count should be

543
विज्ञापन