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क्या रेपो रेट बढ़ाना महंगाई नियंत्रण का उचित विकल्प है? करंट अफेयर्स पर अंडर 30 की सोच

बेरोजगारी की वर्तमान दशा देखते हुए बैंक कर्ज का महंगा होना एक अच्छा संकेत नहीं होगा।

Danik Bhaskar | Jun 09, 2018, 03:00 AM IST
25 वर्षीय रजत कौशिक, आईआईटी रुड़क 25 वर्षीय रजत कौशिक, आईआईटी रुड़क
अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछले कुछ समय से कच्चे तेल के दाम में वृद्धि के कारण बढ़ी महंगाई चर्चा में है। हालांकि, ईंधन में महंगाई का एक कारण टैक्स की ऊंची दरें हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने महंगाई बढ़ने की चिंता के बीच बुधवार को मुख्य नीतिगत दर रेपो में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि कर इसे 6.25 प्रतिशत कर दिया। यहां बताना उचित होगा कि रेपो रेट वह दर होती है, जिस दर पर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है। बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को लोन मुहैया कराते हैं। स्पष्ट है की रेपो रेट बढ़ने से बैंक से मिलने वाले सभी तरह के कर्ज बढ़ी हुई ब्याज दर पर मिलेंगे।
बेरोजगारी की वर्तमान दशा देखते हुए बैंक कर्ज का महंगा होना एक अच्छा संकेत नहीं होगा। ऐसे में सवाल यह है कि महंगाई नियंत्रण के लिए रेपो दर का बढ़ाना क्या एक सही कदम है? गौरतलब है कि जॉब निर्मित करने के वादे पर ही 2014 में मौजूदा मोदी सरकार सत्ता में आई थी लेकिन, इस मोर्चे पर यह सरकार खास कुछ कर नहीं सकी है, जिसका विपरीत असर हाल में हुए उपचुनावों में भाजपा को देखने को मिला है। हालांकि, प्रधानमंत्री मुद्रा बैंक योजना से नए व्यवसाय के लिए लोन लेना आसान हुआ है परंतु बढ़ी हुई रेपो दर के कारण महंगी दर पर लोन बेरोजगारों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। पहले ही एसबीआई, पीएनबी और आईसीआईसीआई बैंक भी अपनी ब्याज दरें बढ़ा चुके हैं। ऐसे में महंगाई पर लगाम कसने के लिए बाजार पर नियंत्रण (वस्तुओं तथा सर्विसेज की अधिकतम मूल्य सीमा तय करना) तथा बड़े उद्योगों पर अतिरिक्त टैक्स प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं।
बाजार में पैसे का प्रवाह रोकने और मांग कम करने के लिए छोटे व्यवसायी या बेरोजगार नवागंतुकों को लोन महंगे दर में मुहैया न हो, यह सरकार को सुनिश्चित करना होगा। मोदी सरकार के कार्यकाल में आरबीआई ने पहली बार दरें बढ़ाई हैं। उम्मीद की जा सकती है कि इसका केवल सकारात्मक प्रभाव ही भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़े।