पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • हिंदी के उपभोक्ता तो हैं, पाठक कहां गए?

हिंदी के उपभोक्ता तो हैं, पाठक कहां गए?

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक

शिव प्रसाद जोशी

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

नए मीडिया और पारंपरिक मास मीडिया में हिंदी बेशक लोकप्रिय हो गई है और उसका बाज़ार भी पुख़्ता हो गया है लेकिन साहित्य में उसकी स्थिति ख़ास बदली नहीं है.

हैरानी है कि विशाल उपभोक्ता आबादी वाले हिंदी भूभाग में हिंदी के अख़बार और फिल्में, सीरियल, शो आदि तो ख़ूब चल रहे हैं लेकिन किताबों की दुनिया का अंधेरा जस का तस बना हुआ है.

किताबें बेशक बड़े पैमाने पर आ रही हैं लेकिन इनमें साहित्य के इतर विषय ज़्यादा हैं. उनकी मांग है बाज़ार में, अक्सर प्रकाशक यही कहते हैं.

हिंदी कविता को तो भूल ही जाइए. इस बार का हिंदी दिवस, आधुनिक हिंदी कविता के सबसे बड़े कवियों में एक गजानन माधव मुक्तिबोध की 50वीं पुण्यतिथि (11 सितंबर) से होकर गुज़रेगा.

क्या सचमुच हिंदी \'अंधेरे में\' है. उसका पाठक सिकुड़ गया है, उपभोक्ता बढ़ता जा रहा है.

पढ़िए शिव जोशी का विश्लेषण.

सीरियल और फिल्म

हिंदी साहित्य की इस हालत के लिए कौन ज़िम्मेदार है. बाज़ार का रोना तो बंद करना पड़ेगा. हिंदी कोई समाज से अलहदा चीज़ तो है नहीं कि बाज़ार के संपर्क में आने से छूमंतर हो जाएगी.

क्या हिंदी का प्रकाशन तंत्र इसके लिए ज़िम्मेदार है या हिंदी को मठ बनाकर माला डाले घूम रहे साहित्य और भाषा के दिग्गज इसके ज़िम्मेदार हैं.

मोटा अनुमान है कि हिंदी क्षेत्र की आबादी इस देश में 50 करोड़ से ज़्यादा ही होगी. किताबों के ख़रीदार तो हैं लेकिन वे क्या कंटेंट चाह रहे हैं.

साहित्य ख़रीदने वाला पाठक छिटककर उपभोक्ता ही रह गया है. हिंदी में वो सिर्फ़ सीरियल देखेगा या मसाला फ़िल्म.

हिंदी का अगर एक लोक है तो उसका एक तंत्र भी है. वो सरकार का है, प्रशासन और प्रबंधन का है और वो भाषा और साहित्य का भी है.

इस तंत्र के अधिकारी और कारिंदे हिंदी के भीतर ही वर्चस्व का खेल रचने लग जाते हैं. हिंदी राजभाषा के रूप में इनके विचारों और कृत्यों में उत्पात मचाती है.

सफलता और पुरस्कार

वो वंचितों, सार्थक रचनाकारों और नवांगुतकों को हैरान परेशान और बेदख़ल करती रहती है.

एक लेखक अपने समय को सूंघता हुआ इतना बड़ा और कद्दावर हो जाता है कि उसे बाक़ी लोग तुच्छ घास लगने लगते हैं.

वह घास की नोकों को अपना विरोध मानकर उन्हें कुचलता है. उस जंगल को प्रश्रय देता है जहां उसके गुणगान और आरती में झुका झाड़झंकाड़ उलझा हुआ है.

हिंदी में कंधे रगड़ खा रहे हैं. सत्ता नज़दीकियां सफलता और पुरस्कारों पर नृत्य करती हैं. एक दिल्ली नहीं, हिंदी की कई दिल्लियां हैं. बिल्लियां जो होंगी सो होंगी.

अब भाषा का इतना राजधानीकरण करते रहेंगे तो आप ही बताइए किस भले मानस का मन लगेगा. चारों ओर भगत ही भगत नज़र आते हैं.

भाषा का भगत बनने से किसने रोका है, अच्छी बात है. लेकिन बगुला भगत तो मत बनिए.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और क्लिक करें ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)