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हिंदू वोटों में पड़ती दरार से भाजपा को खतरा

पार्टी ने हिंदू आमसहमति से 2014 का चुनाव जीता था पर अब जातिगत बंटवारा फिर लौट आया है

शेखर गुप्ता | Last Modified - Apr 10, 2018, 04:18 AM IST

हिंदू वोटों में पड़ती दरार से भाजपा को खतरा

भारतीय मतदाताओं में मुस्लिम सिर्फ 15 फीसदी हैं। वे भाजपा को वोट नहीं देते। 1989 के बाद की राजनीति में जब कांग्रेस हिंदी प्रदेशों का वोट बैंक खो बैठी तो मुस्लिम यादवों के साथ हो गए और कुछ अवसरों पर मायावती के दलितों के साथ। इससे कुंठित भाजपा नेता कहा करते थे कि देश पर कौन शासन करेगा इसका वीटो मुस्लिमों के पास है। नरेन्द्र मोदी ने 2014 में इसे बदल दिया। उनकी दलील थी कि यदि मुस्लिम हमें वोट नहीं देते तो ठीक है, दूसरी जगहों पर पर्याप्त वोट हैं।
मुस्लिमों ने उन्हें वोट नहीं दिए, फिर भी उन्होंने विपक्ष का सफाया कर दिया। एक भी मुस्लिम सांसद के बिना उन्होंने 282 सीटें जीत लीं। फिर भाजपा ने 19 फीसदी मुस्लिम अाबादी वाले उत्तर प्रदेश में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा और 77 फीसदी सीटें जीत लीं। उन्होंने और भाजपा ने मुस्लिम नामों को अन्य तरीकों से जगह देने की भी कोशिश नहीं की। आप हमें वोट नहीं देते, हमसे सत्ता में भागीदार बनाए जाने की भी उम्मीद मत रखिए। यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि उनका आकर्षण सारे हिंदू सामाजिक समूहों पर चल गया, जो अब तक भाजपा से बिदकते थे या अपने जातिगत नेताओं के प्रति वफादार थे। 2014 में बड़े पैमाने पर गैर-यादव ओबीसी भाजपा की ओर आ गए। फिर यदि मायावती 2014 के लोकसभा चुनाव में 80 में से कोई सीट जीत न सकीं और 2017 के विधानसभा चुनाव में 19 सीटें ही जीत पाईं तो यह निष्कर्ष तर्कसंगत होगा कि पर्याप्त संख्या में दलित मतदाता भाजपा की ओर चले गए। लोकसभा में भाजपा के 282 सांसदों में 40 दलित भी हैं, जो आरक्षित सीटों से जीते हैं। छह अन्य एलजेपी और टीडीपी जैसे सहयोगियों के थे।
पिछले कुछ माह में नए सवाल खड़े हुए हैं, क्योंकि देशभर में दलितों का गुस्सा और उभार बढ़ रहा है। यह अब जमीनी राजनीति से आए युवा अौर अपनी बात रखने में कुशल दलित नेताओं के उभार के साथ स्थिति बदल गई है। भीमा-कोरेगांव के बाद अजा-जजा अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के विरोध के बाद 85 फीसदी वोटों में ही चुनाव लड़ने का तरीका जोखिमभरा है। दलित गुस्से के कारण वोटों का यह प्रतिशत घटकर 70 फीसदी होने का खतरा पैदा हो गया है। डेक्कन क्रॉनिकल में लिखे लेख में सीएसडीएस के अग्रणी सेफोलॉजिस्ट संजय कुमार ने यह पुष्टि की है कि पहले की तुलना में भाजपा को 2014 में सर्वाधिक दलित वोट मिले। उन्होंने लिखा, ‘पिछले कई लोकसभा चुनाव में मोटेतौर पर 12 से 14 फीसदी दलितों ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया।’ लेकिन 2014 में यह आंकड़ा दोगुना होकर 24 फीसदी हो गया और भाजपा के दलित वोट कांग्रेस (19) और बसपा (14) से ज्यादा हो गए। दलितों में हाल में बढ़ी बेचैनी से इन फायदों को खतरा पैदा हो गया है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन से यह समीकरण और जटिल हो गया है। यह गोरखपुर व फूलपुर उपचुनाव से स्पष्ट है।
उत्तर प्रदेश के जिन तीन सांसदों ने शिकायत की, वे इस नई असुरक्षा को जाहिर करते हैं। तथ्य यह है कि अजा-जजा अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मामले में सरकार शायद ही कोई भूमिका निभा सकती है। आदेश को सावधानी पूर्वक पढ़ें तो ऐसा नहीं लगता कि एक अच्छे कानून को कमजोर कर दिया गया है। राष्ट्रव्यापी तीखी दलित प्रतिक्रिया और विरोध बताता है कि भीतर रुका हुआ गुस्सा बाहर आ रहा है। प्रधानमंत्री और अमित शाह इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि 2019 आने दो ‘मोदी मैजिक’ सब कुछ मिटा डालेगा। वे 2014 के 24 फीसदी मतों में से कुछ भी खोने की स्थिति में नहीं हैं। उनका कुल पार्टीगत आकड़ा 31 फीसदी था और चौथाई दलित वोटों के बगैर इतना प्रतिशत बनाए रखना असंभव होगा।
दलितों का यह उभार पहले की तुलना में अलग है। अब कहीं अधिक दलित युवा स्कूल-कॉलेज जा रहे हैं और इंटरनेट की उपलब्धता आसान होने के कारण यह अधिक जागरूक पीढ़ी है। युवा नेता और पहली बार विधायक बने जिग्नेश मेवाणी जैसे नेता उत्तर, मध्य व पश्चिम भारत में लगभग कहीं भी अच्छी-खासी भीड़ जुटा सकते हैं। फिर यह पूर्व की तुलना में अधिक वैचारिक भी है। इसकी चाल-ढाल खासतौर पर वामपंथी है और इसीलिए भाजपा विरोधी। 1989 तक भाजपा मानती थी कि हिंदू समाज में जातिगत विभाजन के कारण वह जीत नहीं पाती। आडवाणी ने पहली बार इसे पहचाना और धर्म से उसे जोड़ना (अयोध्या के जरिये) शुरू किया, जिसे जाति ने बांट रखा था। लेकिन, जाति के प्रति वफादारी ज्यादा समय दबी नहीं रह सकती। उत्तर प्रदेश में जहां कभी इसका बहुमत था मायावती और मुलायम/अखिलेश आठ बार बारी-बारी से मुख्यमंत्री बने। मोदी-शाह ने 2014 में जिन बातों का मिला-जुला स्वरूप सामने रखा वह चौथाई सदी पहले आडवाणी से अधिक प्रबल था। वे खुला हिंदू राष्ट्रवाद लेकर आए जिसके साथ था मोदी का आकर्षण और ‘अच्छे दिन’ का वादा, जो गुजरात के रिकॉर्ड के कारण विश्वसनीय लगता था। यह सारी जाति आधारित पार्टियों पर हावी हो गया और भाजपा ने हिंदी प्रदेशों में शानदार जीत हासिल की।
अब दलित समर्थन खतरे में है, क्योंकि जातिगत समीकरण फिर बदल रहा है। सत्ताविरोधी रुख से उपजा असंतोष, बेरोजगारी, उत्तर प्रदेश में ऊंची जाति के शक्तिशाली मुख्यमंत्री का उदय (15 वर्षों में ऊंची जाति से पहला) ने मिलकर फिर जातिगत समीकरण को महत्वपूर्ण बना दिया है। भाजपा ने तेजी से इसे पहचान लिया है और मोदी-शाह इस बारे में बोल भी रहे हैं। लेकिन, उनके सामने तीन समस्याएं हैं : एक, उनके पास कोई प्रमुख और यकीन दिलाने वाली दलित आवाज नहीं है। दो, भूतकाल में भाजपा ने मोदी और शिवराज सिंह चौहान जैसे स्टार ओबीसी नेता पैदा किए थे, 2014 के बाद उच्च जाति का उदय दिखाई दिया है खासतौर पर महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में। तीन, संभव है इसे महसूस करने में उन्हें देरी हो गई हो। पार्टी और खुफिया मशीनरी दलितों में बढ़ती कुंठा को समय रहते पकड़ने में नाकाम रही। लेकिन, अब पार्टी ने यह मुद्‌दा उठा लिया है। यह नुकसान की कितनी भरपाई कर पाती है, 2019 के आंकड़ों पर उसका महत्वपूर्ण असर रहेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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