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मिर्च की तरह हिंदुत्व का कम उपयोग ही ठीक- चेतन भगत

हाल के उपचुनावों में भाजपा का फीका प्रदर्शन और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व

Danik Bhaskar | Jun 09, 2018, 02:32 AM IST
चेतन भगत अंग्रेजी के युवा उपन् चेतन भगत अंग्रेजी के युवा उपन्

एक बार की बात है एक भारतीय रेस्तरां हुआ करता था। एक दिन शेफ ने दाल की प्लेट में आधी हरी मिर्च डालने का फैसला किया। ग्राहकों को दाल बहुत पसंद आई। उन्होंंने शहर के अन्य सारे बेमजा रेस्तरां छोड़ दिए और इस जगह टूट पड़े। हरी मिर्च के चमत्कार से रोमांचित शेफ ने अब दाल की हर प्लेट में पांच मिर्चियां डालने का फैसला किया। इस बार ग्राहक भाग खड़े हुए। वे बेचारे पानी के लिए गिड़गिड़ाने लगे और उन्हें अपने पुराने बेमजा रेस्तरां में ही राहत मिली। शेफ सिर खुजाने लगा कि यह क्या हो गया।
उपचुनाव के नतीजों के बाद शायद सिर खुजाने की यह क्रिया भाजपा मुुख्यालय पर हो रही हो। अपने बल पर भाजपा ने चार में से एक लोकसभा सीट और दस में एक विधानसभा सीट जीती। भाजपा के मामले में हरी मिर्च यानी हिंदुत्व। यह मतदाताओं के एक तबके पर गजब का असर दिखाता है। लेकिन, यहां एक शर्त है कि यह केवल छोटी खुराक में ही अद्‌भुत असर दिखाता है। हिंदुत्व को जरूरत से ज्यादा उठाइए और यह पांच मिर्च वाली दाल का मामला बन जाता है। वही दाल जो आपने मजे से खाई थी, दु:स्वप्न बन जाती है। हिंदुत्व का यह नाजुक संतुलन, जिसके तहत इसे होना भी चाहिए और फिर भी जरूरत से ज्यादा भी न हो, भाजपा के लिए बहुत कठिन है। ऐतिहासिक रूप से यह इसमें आखिरकार नाकाम ही होती है। अतिवाद एक फिसलन है और एक बार आप नीचे की राह पर चलें जाएं तो अंतत: आप और अधिक नीचे धंसते जाते हैं। वाजपेयी ने यह संतुलन साधा और वे प्रधानमंत्री बने। आडवाणी यह नहीं कर सके और वे कभी केंद्र में सर्वेसर्वा नहीं बने। मोदी ने भी संतुुलन को बहुत अच्छी तरह साधा। हिंदुत्व के हल्के से संदेश के साथ विकास पर बल देने वाले प्रचार अभियान ने इतना अच्छा काम दिखाया कि उन्होंने स्वतंत्र भारत का सर्वेश्रेष्ठ जनादेश हासिल किया।
जब 2014 में एनडीए सरकार सत्ता में आई तो लोगों को इससे ऊंची, शायद अवास्तविक आशाएं थीं। वित्त मंत्री पद के लिए बड़े-बड़े बैंक सीईओ के नाम चल रहे थे। कई लोगों को भरोसा था कि प्रधानमंत्री अपने आसपास टेक्नोक्रेट और विशेषज्ञों का समूह इकट्‌ठा कर लेंगे,जो विश्वस्तरीय नीतियां बनाकर भारत की आर्थिक वृद्धि की क्षमता को खोल देंगे। बेशक, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सच तो यह है कि बौद्धिक क्षमता में भाजपा यूपीए से पीछे रह गई, जिसके पास अपने ख्यात बौद्धिक चेहरे थे- डॉ. मनमोहन सिंह, जयराम रमेश, नंदन नीलेकणि और शशि थरूर। मौजूदा सरकार में उनकी बराबरी के लोग मिलना मुश्किल है, नहीं? एक नियुक्ति में सरकार को कुछ प्रशंसा मिली, आरबीआई गवर्नर के रूप में रघुराम राजन, पर उसका अंत भी ठीक नहीं रहा।
यह जरूर हुआ कि संतुलन हिंदुत्व के पक्ष में और झुक गया। चाहे गोमांस की बिक्री पर प्रहार हो या पद्‌मावत पर मौन, थोपा हुआ राष्ट्रवाद या भाजपा सांसदों, विधायकों के सांप्रदायिक बयान हो भारत लगातार अधिक सांप्रदायिक, अधिक बहुसंख्यकवादी देश होने की ओर झुकता चला गया। इसका अर्थ यही था कि हरी मिर्च दाल में बढ़ती चली गई। इस सब में सरकार भारतीय हिंदुओं के बारे में एक प्रमुख अंतर्दृष्टि चूक गई। सही है कि हिंदुअों का बड़ा तबका मुुस्लिमों पर श्रेष्ठता का अहसास चाहता है। सही हो या गलत पर उनमें एक हिंदू अधिकार और अल्पसंख्यकों को ‘उनकी जगह’ रखने की एक अवधारणा है। जब तक शांति है तब तक जीयो और जीने दो का रवैया एकदम ठीक है। और न ये हिंदू (थोड़े कट्‌टरपंथियों को छोड़कर) धार्मिक राज्य चाहते हैं। हिंदू अपने पंडितों का सम्मान तो करते हैं पर उन्होंने कभी इन पंडितों को अपनी ज़िंदगी चलाने नहीं दी।
किंतु सरकार ने हरी मिर्च के भारी डोज़ -उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ की नियुक्ति- में यह सब चूक गई। शायद मार्गदर्शक सिद्धांत यही रहा होगा ‘लोगों को हरी मिर्च पसंद है, आइए उन्हें कुछ और दें।’ अन्य सारे राज्यों में जहां वे जीते उन्होंने काम करने वाला, लो प्रोफाइल मुख्यमंत्री नियुक्त किया और जो निश्चित ऐसा व्यक्ति तो नहीं था, जो भगवा कपड़े पहनता हो और कड़े विवादास्पद हिंदुत्व के वक्तत्व देता हो। फिर भी उनकी नियुक्ति के कई कारण दिए गए। इनमें से कुछ ये थे- उन्होंने कई बार चुनाव जीते। वे अद्‌भुत वक्ता हैं। वे बहुत अच्छे प्रशासक सिद्ध होंगे- आप धैर्य रखकर देखें तो। भगवाधारी धर्माचार्य को मुख्यमंत्री बनाने का मोदी पर संदेह करने वालों के लिए यही अर्थ था कि इससे भाजपा के एजेंडे में हिंदुत्व का महत्व और मजबूत हुआ है। तब तक तो सरकार द्वारा सांप्रदायिक घटनाअों की अनदेखी करने का ही मामला था। प्रधानमंत्री द्वारा योगी की नियुक्ति आधुनिक युग की भाजपा की छवि में निर्णायक बिंदु था। यह ऐसा ही था जैसे भाजपा बैनर लेकर कह रही हो, ‘यह हम हमेशा से थे और अब भी हैं, अब इससे निपटो।’ अब दाल में आधी मिर्च नहीं थी। उसमें पांच मिर्च थीं।
इस नियुक्ति ने विपक्ष को मुद्‌दा दे दिया। आपसी मतभेदों के बावजूद मोदी के खिलाफ एकजुट होने का उन्हें कारण मिल गया। अब सारे विपक्षियों की एकजुटता को अवसरवादी गठबंधन के रूप में नहीं देखा जाएगा। इसे तारणहार माना जाएगा, हरी मिर्च से बचाने वाला चीनी का बाउल। अचरज नहीं कि उदारवादी मीडिया इसे समर्थन देने लगा है, फिर चाहे गठबंधन के व्यक्तिगत सदस्यों पर उन्हें कोई आपत्ति ही क्यों न हो। इसलिए हाल के उपचुनाव में हमने देखा कि विपक्ष न सिर्फ सफलतापूर्वक अपने वोट एकजुट करने में कामयाब रहा बल्कि उसने भाजपा के वोट शेयर से भी कुछ वोट चुरा लिए। बेशक, कमजोर प्रदर्शन के कुछ अन्य कारण भी रहे। मोदी का घटता आकर्षण, सरकार के प्रदर्शन से समाज के कई वर्गों की हताशा और स्थानीय मुद्‌दे भी वजह थे। हालांकि, योगी आदित्यनाथ की नियुक्ति सबसे बड़ा निर्णायक बिंदु था, जो 2019 में विपक्ष को एकजुट होने में सहायक होगा।
2019 में जीत हासिल करने के लिए विपक्ष को अभी लंबा रास्ता तय करना है। यह अलग विषय है कि वे वास्तव में कैसी सरकार हमें देंगे। अभी तो इस सबसे भाजपा को एक सबक सीखना है- लोग चाहे कितना ही पसंद करते हों, हरी मिर्च का जरूरत से ज्यादा डोज़ कभी मत दो।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)