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मोदी के मिशन में जुटा है ये IAS, 6 महीने में बदल दी 144 महिलाओं की LIFE

3 वर्ष पहले
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रायपुर. पीएम नरेंद्र मोदी अंबेडकर जयंती के मौके पर बीजापुर पहुंचे। यहां उन्होंने सविता साहू से मुलाकात की, जो कि राज्य में ई-रिक्शा चलाकर परिवार का पेट पालती हैं। मोदी ने अपनी स्पीच में कहा, "आज मुझे सविता साहु के ई-रिक्शा पर सवारी का अवसर मिला। सविता जी के बारे में मुझे बताया गया कि उन्होंने नक्सली-माओवादी हिंसा में अपने पति को खो दिया था। इसके बाद उन्होंने सशक्तिकरण का रास्ता चुना, सरकार ने भी उनकी मदद की और अब वो एक सम्मान से भरा हुआ जीवन जी रही हैं। केंद्र की ई-रिक्शा योजना से छत्तीसगढ़ की कई महिलाओं ने खुद को सशक्त बनाकर अपनी जिंदगी बदली है। कुछ सक्सेस स्टोरीज DainikBhaskar.com अपने रीडर्स को बता रहा है।

 

चमेली की रिक्शा

 

- दंतेवाड़ा जिले के अंतरगत आने वाले एक गांव की रहनेवाली चमेली तब महज 15 साल की थी, जब उसके बड़े भाई बारी-बारी से अपने बीमार पिता को गोदी में उठाकर हॉस्पिटल लेकर जाते थे। उन्हें हर रोज 12 किमी पैदल आना-जाना पड़ता था।
- अपने गांव की इस समस्या को सुलझाने का काम चमेली ने अपने हाथ में लिया। आज वो ई-रिक्शा चलाती है। अब सिर्फ उसके लिए ही नहीं, बल्कि पूरे गांव के लिए शहर आने-जाने की दिक्कत खत्म हो गई है।

 

कलेक्टर ने उठाया महिलाओं को सशक्त बनाने का कदम

 

- दंतेवाड़ा जिला कलेक्टर सौरभ कुमार ने पिछले साल सितंबर में जिले का पहला आजिविका कॉलेज (लाइवलीहुड कॉलेज) शुरू किया।
- उन्होंने एक महीने का आवासीय कार्यक्रम शुरू किया, जिसके तहत गांव की महिलाओं को ई-रिक्शा चलाने की ट्रेनिंग दी गई। 
- इस अनोखे कॉलेज में सुबह 10.30 बजे से शाम 5.30 बजे के बीच हफ्ते में 6 दिन क्लास चलती हैं। इन क्लासों में ड्राइविंग टेक्निक, ट्रैफिक रूल्स, मशीन मेंटेनेंस और ई-रिक्शा से जुड़े छोटी-बड़ी बातें सिखाई जाती हैं।
- इस कॉलेज के प्रिंसिपल कृतेश हिरवानी ने बताया, "हमने शुरुआत 30 महिलाओं के साथ की थी। एक साल से भी कम समय में हम 144 से ज्यादा महिलाओं को ट्रेनिंग दे चुके हैं। इनमें से 56 महिलाओं ने खुद की ई-रिक्शा भी खरीदी है।"

 

50 फीसदी लोन हो चुका है पूरा

 

- दंतेवाड़ा के गांवों में रहनेवाली 21-22 साल की लड़कियां ई-रिक्शा चला रही हैं।
- टेकनार गांव की फूलमती भास्कर बताती हैं, "आजीविका कॉलेज की ट्रेनिंग से मेरे परिवार को बहुत फायदा हुआ। अब मैं भी परिवार की आमदनी में 10 हजार रुपए महीना तक का योगदान देती हूं। ई-रिक्शा खरीदने के लिए मैंने लोन लिया था, जिसका 50 फीसदी मैं लौटा चुकी हूं।"

 

2009 बैच के आईएएस हैं सौरभ

 

- लखनऊ के रहनेवाले सौरभ कुमार ने इलाहाबाद के मोतीलाल नेहरू नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नलॉजी से बीटेक किया है। इंजीनियरिंग के बाद इन्होंने सिविल सर्विसेज ज्वाइन करने का फैसला किया। ये साल 2009 में IAS बने थे। उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर मिला है।
- पोस्ट संभालने के साथ ही सौरभ छत्तीसगढ़ के लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने में लगे हैं। दंतेवाड़ा में स्कूल एजुकेशन का स्तर सुधारने के लिए इन्होंने 'लंच विद कलेक्टर' नाम से स्कीम शुरू की थी। 
- इस स्कीम के तहत सौरभी जिले के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों से सीधे बातचीत करते हैं। दो घंटे की करियर काउंसलिंग में वे उन्हें प्रॉफेशनल कोर्स ऑप्शन्स के बारे में बताते हैं। 
- साथ ही बच्चों को अपने सीनियर अधिकारियों के साथ मिलकर अपनी इंस्पायरिंग स्ट्रगल स्टोरीज बताते हैं, जिससे वे प्रेरणा ले सकें।
- काउंसलिंग सेशन में टीचर और स्कूल का अन्य स्टाफ भी शामिल होता है। 
- हर 15वें दिन टॉपर बच्चों के पेरेंट्स को बुलाकर उनके साथ बच्चे का फ्यूचर कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, इस पर सेशन लेते हैं।

- IAS सौरभ को उनके प्रयासों के लिए पीएम एक्सिलेंस अवॉर्ड मिल चुका है।

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