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महाभारत 2019 विश्लेषण: क्या मायावती ने बदला चुनाव का समीकरण?

कर्नाटक चुनाव के नतीजों के बाद राष्ट्रीय राजनीति के लिए तीन महत्वपूर्ण सबक

Danik Bhaskar | May 16, 2018, 03:11 AM IST
शेखर गुप्ता  ‘द प्रिंट’ के एडि शेखर गुप्ता ‘द प्रिंट’ के एडि
यह लिखते समय भाजपा की जीत पूरी तरह सील नहीं हुई थी लेकिन, कांग्रेस की पराजय मुक्कमल थी। नरेन्द्र मोदी ने फिर दिखा दिया है कि उनसे राहुल गांधी का कोई मुकाबला नहीं है। पहले भी इसमें संदेह नहीं था पर कर्नाटक के नतीजों ने विशुद्ध अखिल भारतीय नेता के रूप में मोदी के उदय पर मुहर लगा दी है। हमारे राजनीतिक इतिहास में नेहरू व इंदिरा के बाद वे ऐसे सिर्फ तीसरे नेता हैं। इसलिए नतीजे में तीन प्रमुख सबक हैं :
1. गठबंधन की प्रक्रिया अब ऐसी होगी, जो चार दशकों में देखी नहीं गई। जो दल वैचारिक अथवा वोट आधार में भाजपा से इतने भिन्न हैं कि उसके साथ कभी जा नहीं सकते, उनके सामने मोदी के टक्कर की कहानी बुनने की चुनौती होगी। आज यह चुनौती दुर्गम लगती है। यदि वे एकजुट होते हैं और एक नेता चुनते हैं तो मोदी बनाम ए, बी या सी अध्यक्षीय प्रणाली जैसा अभियान आसान होगा। यदि ऐसा नहीं करते तो वे किस्तों में खत्म हो जाएंगे।
जिन दलों पर वैचारिकता का बोझ नहीं है उनके लिए हमेशा ही दिल्ली में आने वाली पार्टी विकल्प होती है ताकि अपना हिस्सा ले सकें। अखिलेश, ममता यहां तक कि मायावती भी लेकिन, वाम दलों के पास यह लचीलापन नहीं है। शरद पवार सहित बाकियों का क्या? खासतौर पर तब जब शिवसेना भाजपा से अलग ही रहे।
यह कैसे होगा? मैं देवेगौड़ा के पुत्र कुमारस्वामी से वॉक द टॉक इंटरव्यू (2006) में मिले जवाब को उद्‌धृत करूंगा। ‘जब भाजपा को बाहर रखने के लिए बनी धर्मनिरपेक्ष एकता ने उनके पिता को प्रधानमंत्री बनाया तो उन्हें भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बनते दुविधा नहीं होती? उन्होंने कहा- ‘मेरे पिताजी ने प्रधानमंत्री बनकर बड़ी गलती की, क्योंकि वे राज्य में अपना फोकस गंवाकर यहां पावर खो बैठे। सारे क्षेत्रीय दलों को द्रमुक/अन्नाद्रमुक से सबक लेना चाहिए। अपने राज्य में पावर होगी तो दिल्ली में कोई भी आपको राष्ट्रीय सत्ता में हिस्सा देने को राजी होगा।’ यह अब और भी लागू होता है। फर्क यह है कि चुंबक अब कांग्रेस के प्रभुत्व वाला ‘सेकुलर’ न होकर भाजपा के नेतृत्व का ‘नेशनलिस्ट’ है। आरएसएस विचारक शेषाद्रि चारी कहते हैं कि 2019 में मोदी बनाम ‘कोई नहीं’ होगा तो यह अतिशयोक्ति नहीं है। सवाल यह है कि यह समीकरण सालभर रहेगा? लेकिन, आज कोई विश्लेषण यह संकेत नहीं देता कि समीकरण में बदलाव कैसे होगा?
2. दूसरा सबक यह कि किसी भी त्रिकोणीय चुनाव में भाजपा ही विजेता होगी। यह इतिहास दोहराने का मामला है। इंदिरा गांधी 1969 और 1973 के बीच जो थीं, वही आज नरेन्द्र मोदी हैं। जब सारे नेता व दल उनके खिलाफ एकजुट होते तो उन्हें फायदा मिलता। उन्हें तो सिर्फ यह कहना होता कि मैं ‘गरीबी हटाना चाहती हूं’ और यह सारी एकजुटता सिर्फ मेरे प्रति नफरत के कारण है। कोई वैचारिक आधार नहीं कि यह हताश किस्म का जमावड़ा किसी एक नेता पर सहमत हो जाए।
तथ्य: इमरजेंसी तक यह उनके काम आया और 1977-80 के संक्षिप्त अपवाद के बाद में भी यही हुआ। इंदिरा की जेलों से बाहर आए नेता जनता पार्टी के रूप में इकट्‌ठे हुए पर जैसा उनका अनुमान था, ढाई साल में बिखर गए। भाजपा (तब भारतीय जनसंघ) दूसरे छोर पर थी, अब वहां कांग्रेस है। क्या विपक्ष इससे सीख सकता है और कोई इनोवेटिव आइडिया लाता है? अभी तो हमें कांग्रेस या शेष विपक्ष में ऐसा कोई आत्मपरीक्षण या बौद्धिक पुनर्विचार नहीं दिखता।
3. पुराने मैसूर/दक्षिण कर्नाटक में भाजपा ने एग्जिट पोल अनुमानों से भी बेहतर प्रदर्शन किया। वोकालिंगा और लिंगायतों की उपेक्षा कर ‘शेष’ के साथ गठजोड़ की कांग्रेस की दुस्साहसी रणनीति नाकाम रही। कर्नाटक विविधता भरा चुनाव क्षेत्र है और तीनों में से हर दल ने अपने कॉम्बिनेशन पर फोकस रखा। हमें इससे दो नतीजे अपेक्षित हैं : एक, कोई दल सारी जातियों के परे पूरे राज्य में प्रभाव पैदा नहीं कर सका। दूसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण यह कि केवल जद (एस) के लिए यह काम आया। इसके गढ़ में और वहां जहां कांग्रेस को इससे सीटे छीनने की उम्मीद थी। यहां नया तत्व मायावती है, जिन्होंने जद (एस) का समर्थन कर प्रचार भी किया। क्या उन्होंने उन दलित वोटों का रुख मोड़ा, जिसकी कांग्रेस को अपेक्षा थी? हम अभी नहीं जानते। लेकिन, लगता नहीं कि दलित वोट नहीं बंटते तो जद (एस) इतना अच्छा और कांग्रेस इतना खराब प्रदर्शन करती। तो क्या मायावती कर्नाटक चुनाव का एक्स फैक्टर है? हमें जल्द ही अधिक स्पष्टता से यह मालूम हो जाएगा। इसीलिए मैं यह कहने का लालच रोक नहीं पा रहा हूं कि उत्तर प्रदेश के खैराना उपचुनाव में जो होगा उसका 2019 के चुनाव पर उतना ही प्रभाव होगा, जितना कर्नाटक 2018 का।