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भारत कराए अमेरिका व ईरान के बीच समझौता

महंगे तेल की मार से चाबहार योजना ठप हुई तो ग्वादर बंदरगाह तक पहुंच के लिए चीन की ओर झुकेगा ईरान

वेदप्रताप वैदिक | Last Modified - May 12, 2018, 06:09 AM IST

भारत कराए अमेरिका व ईरान के बीच समझौता

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तहलका मचा दिया है। उन्होंने ईरान से हुए परमाणु-समझौते के बहिष्कार की घोषणा करके सारी दुनिया को हक्का-बक्का कर दिया है। लोगों के दिमाग में कई सवाल कौंधने लगे हैं। क्या ईरान अब दुबारा परमाणु बम बनाने में जुट जाएगा? क्या इजरायल और ईरान में अब खुली मुठभेड़ होगी? क्या पश्चिम एशिया में सऊदी अरब और ईरान के बीच वर्चस्व की लड़ाई छिड़ जाएगी? क्या इजरायल और ईरान की आड़ में अब अमेरिका और रूस एक-दूसरे के विरुद्ध जोर आजमाइश करेंगे? इस समझौते के टूटने से कहीं तीसरा विश्व-युद्ध तो नहीं भड़क उठेगा?
यह समझौता जुलाई 2015 में हुआ था। इस पर ईरान के अलावा अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी ने दस्तखत किए थे। इसे संपन्न करने के लिए ईरान के साथ इन देशों ने कई वर्षों तक कूटनीतिक वार्ता चलाई थी और कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध थोप दिए थे। ईरान की अर्थव्यवस्था लगभग चौपट हो रही थी। समझौता यह हुआ था कि ईरान परमाणु बम नहीं बनाएगा और यूरेनियम को संशोधित नहीं करेगा। इसके परिणामस्वरुप ईरान ने पिछले तीन साल में अपने 13,000 सेंट्रीफ्यूजेस और 97 प्रतिशत संशोधित यूरेनियम को नष्ट कर दिया। ईरान कहीं भी चोरी-छिपे परमाणु बम तो नहीं बना रहा है, इस संदेह को मिटाने के लिए ईरान ने वियना की अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी की कड़ी निगरानी भी स्वीकार की है। एजेंसी का कहना है कि ईरान समझौते की सभी शर्तों का ईमानदारी से पालन कर रहा है। इस समझौते के बाद अमेरिका सहित सभी राष्ट्रों ने ईरान पर से प्रतिबंध उठा लिए थे। ईरान की अर्थव्यवस्था भी फिर से पनपने लगी थी।
लेकिन, अमेरिका में हुए राष्ट्रपति के चुनाव के वक्त से ही ट्रम्प ने इस समझौते की कड़ी भर्त्सना शुरू कर दी और वादा किया था कि वे इसका बहिष्कार करेंगे। किसी तरह लगभग डेढ़ साल तक उन्होंने इसे चलने दिया और अब उन्होंने बाकायदा इसे छोड़ने की घोषणा कर दी है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा है कि ईरान पर सारे प्रतिबंध दोबारा लागू करेंगे और जो राष्ट्र ईरान की मदद करेंगे, उन पर भी ये प्रतिबंध लागू कर दिए जाएंगे। ट्रम्प का तर्क यह है कि यह समझौता बड़ा मूर्खतापूर्ण है। इसमें भयंकर धोखाधड़ी होने वाली है। इसमें ईरान को यह छूट दे दी गई है कि 2025 के बाद वह इस समझौते के बंधन में नहीं रहेगा यानी 2025 के बाद वह परमाणु बम बना लेगा। क्या मालूम वह अभी भी परमाणु बम की तैयारी कर रहा है या नहीं ?
ट्रम्प के दावों का अंध-समर्थन इजरायल कर रहा है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पिछले हफ्ते एक बड़े पत्रकार सम्मेलन में 10 हजार पेज के गुप्त ईरानी दस्तावेज पेश करके यह सिद्ध करने की कोशिश की कि ईरान परमाणु बम बनाने पर डटा हुआ है। इजरायल और ईरान का 36 का आंकड़ा है। ईरान की मदद फिलिस्तीनियों, लेबनानी शियाओं और इजरायल-विरोधी हर संगठन को मिलती रहती है। यदि ईरान के पास परमाणु बम आ जाता है तो अरब देशों पर इजरायल की आधी दहशत अपने आप खत्म हो जाएगी। शिया-सुन्नी विवाद के कारण सऊदी अरब से ईरान की पहले से ठनी हुई है। ये दोनों राष्ट्र ट्रम्प के चहेते हैं। इसके अलावा ईरान के खिलाफ ट्रम्प इसलिए भी है कि वह सीरिया के शासक बशर अल-असद की खुलकर मदद कर रहा है। इस काम में रूस पूरी तरह से ईरान का साथ दे रहा है। चीन का भी उसे कूटनीतिक समर्थन प्राप्त है। इनके विपरीत इजरायल और अमेरिका सीरिया में असद के खिलाफ जबर्दस्त फौजी मोर्चा लगाए हुए हैं। ट्रम्प की घोषणा के बाद सीरिया में ईरानी और इजरायली फौजों के बीच जमकर युद्ध हुआ है। डर यही है कि यह युद्ध रूस और अमेरिका के बीच न छिड़ जाए।
ट्रम्प ने परमाणु-समझौते का जो बहिष्कार किया है, उसका इजरायल के अलावा किसी भी महत्वपूर्ण राष्ट्र ने समर्थन नहीं किया है। इस समझौते पर दस्तखत करने वाले ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे अमेरिका के परम मित्र राष्ट्रों ने भी ईरान से कहा है कि वे इस समझौते को अब भी मानते हैं और आगे भी मानते रहेंगे। लेकिन, इस आश्वासन के बावजूद मुझे नहीं लगता है कि वे अमेरिकी विरोध के मुकाबले टिक पाएंगे। फ्रांस के राष्ट्रपति एमेन्यूएल मेक्रां ने अपनी वॉशिंगटन-यात्रा के दौरान बीच का रास्ता निकालने के लिए चार-सूत्री फॉर्मूला सुझाया था, जो ट्रम्प के विचारों के करीब था। इसके अलावा सभी राष्ट्रों को पता है कि ट्रम्प का कोई भरोसा नहीं। वे कब क्या कर बैठें? ट्रम्प पहले जलवायु और प्रशांत-क्षेत्र व्यापार समझौते को तोड़ ही चुके हैं। उत्तरी कोरिया के अदम्य तानाशाह किम को वे झुका चुके हैं। लेकिन ईरान, ईरान है, उत्तरी कोरिया नहीं। वह धौंस और धमकियों से डरने वाला नहीं है। पहले भी उसने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की परवाह नहीं की थी। अब यदि वह दुबारा परमाणु बम बनाने पर उतर आया तो यह बड़ी खतरनाक बात हो सकती है। ईरान के नेताओं ने ट्रम्प को उन्हीं के शब्दों में बुरी तरह से शर्मिंदा किया है और नहले पर दहला मारा है।
ईरान पर लगे प्रतिबंधों का असर भारत-जैसे देशों पर काफी घातक होगा। इस समय भारत को तेल भेजने वाले देशों में ईरान का नंबर तीसरा है। भारत के लिए तेल बहुत महंगा हो जाएगा। पहले ही वह काफी महंगा है। मोदी सरकार का सिरदर्द तेज हो जाएगा। इसके अलावा ईरान के चाबहार से हम जो मध्य एशिया के पांच राष्ट्रों और अफगानिस्तान तक पहुंचने के नए रास्ते बनाने वाले थे, यह योजना भी ठप हो जाएगी। कोई आश्चर्य नहीं कि चाबहार योजना के ठप होते ही ईरान कोशिश करेगा कि वह चीन से सहयोग बढ़ाए ताकि उसे पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के इस्तेमाल की सुविधा मिल सके। चाहबहार से ग्वादर सिर्फ 80 किमी है।
ऐसी स्थिति में भारत को एक तटस्थ-सा बयान देकर चुप नहीं बैठना चाहिए। भारत ने ईरान और अमेरिका से अनुरोध किया है कि वे इस मामले को शांतिपूर्ण ढंग से हल करें। यह काफी नहीं है। भारत इस समय अमेरिका और ईरान, दोनों का घनिष्ट मित्र है। किसी भी बड़े राष्ट्र की स्थिति इस मामले में आज वह नहीं है, जो भारत की है। यदि भारत पहले करे तो उक्त परमाणु-समझौते को अब इस तरह से ढाला जा सकता है कि वह सभी पक्षों को मान्य हो जाए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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