संपादकीय

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वित्तीय सुधार और नौकरियां पैदा करने पर ही दारोमदार

पिछले दिनों कई राज्यों में जिस तरह करेंसी का संकट पैदा हो गया है उससे लगता है कि नोटबंदी का दुष्प्रभाव अब भी शेष है।

Danik Bhaskar

Apr 19, 2018, 01:57 AM IST
अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (IMF) का अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (IMF) का
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने मंगलवार को अपने द्विवार्षिक विश्व आर्थिक दृष्टिकोण में भारत के लिए जीडीपी वृद्धि का पूर्वानुमान न बदलते हुए 2018-19 के लिए 7.4 फीसदी पर ही रखा है लेकिन, उन्हीं दो बिंदुओं पर जोर दिया है, जिसके लिए सारा देश गुहार लगा रहा है। एक तो देश नौकरियों के पैदा होने के रोड़े दूर कर युवा आबादी के फायदे को भुनाए और दूसरा सार्वजनिक क्षेत्रों के बैकों में कामकाज सुधारने के लिए आमूल बदलाव लाए। जहां तक नौकरियों का सवाल है उसके लिए आईएमएफ ने जो नुस्खा बताया है वह जाहिर-सा है कि श्रम बाजार में सख्ती कम करे। साथ ही बुनियादी ढांचे के विकास में आ रहीं अड़चनें दूर करनी होगी और शिक्षा के स्तर पर सुधार करने की जरूरत है। कार्यकाल के अंतिम वर्ष में केंद्र सरकार से किसी भी क्षेत्र में बुनियादी सुधार की उम्मीद नहीं है और नई शिक्षा नीति का अब तक पता नहीं है। आईएमएफ ने वृद्धि की उम्मीद निजी खपत बढ़ने और आखिरकार नोटबंदी और जीएसटी के कम होते दुष्प्रभावों से भी लगाई है। लेकिन, पिछले दिनों कई राज्यों में जिस तरह करेंसी का संकट पैदा हो गया है उससे लगता है कि नोटबंदी का दुष्प्रभाव अब भी शेष है, क्योंकि पुराने नोट हटाने की भरपाई अब तक नहीं हो पाई है। जहां तक सरकारी बैंकों में बट्‌टे खाते के कर्ज का सवाल है पुनर्पूंजीकरण की घोषणा करके निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि बैंक होती ही ऋण देने के लिए और जब तक कर्ज प्रबंधन की मुकम्मल व्यवस्था नहीं होगी, मौजूदा संकट से उनका उबरना तो मुश्किल होगा ही, इस तरह के मामले फिर नहीं सामने आएंगे, इसकी भी गारंटी नहीं दी जा सकेगी। जहां तक अनुकूलताओं की बात है तो दुनियाभर में संरक्षणवादी नीतियों के बढ़ते चलन के बाद भी मध्यावधि में दुनिया की अार्थिक रफ्तार बढ़ेगी, जिसका फायदा भारत को भी मिलेगा। फिर सामान्य मानसून की घोषणा भी राहत देने वाली है। हालांंकि अभी इसकी पुष्टि जून में अंतिम घोषणा के बाद ही हो पाएगी। कुल-मिलाकर आर्थिक परिदृश्य उत्साहपूर्ण दिखता है लेकिन, इसी प्रकार का वातावरण पिछले वर्षों में भी रहा है बल्कि उसमें तो कच्चे तेल की कीमतें भी अनुकूल रही थीं लेकिन, उसका पर्याप्त सकारात्मक प्रभाव देखा नहीं जा सका और भारतीय अर्थव्यवस्था पर एक तरह की निराशा का साया छाया रहा है।
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