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कुछ करने की ठान लें तो स्वीकार या नकार से फर्क नहीं पड़ता

देवदत्त पटनायक ने मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मायथोलॉजी के कोर्स में प्रवेश ले लिया था।

चंडीदत्त शुक्ला | Last Modified - May 13, 2018, 11:59 PM IST

मुंबई में मेरा जन्म हुआ। यहां रहते हुए 47 साल बीत गए। मैं मुंबई का लड़का हूं, यही मेरा गांव है। माता-पिता उड़ीसा से थे, मुझे भी उड़िया का ज्ञान है, लेकिन स्वयं ज्यादातर मराठी बोलता हूं। आध्यात्मिकता के प्रति मेरी गहन रुचि को मां-पापा से कोई खास समर्थन नहीं मिला। तमाम सामान्य अभिभावकों की तरह वे भी यही चाहते थे कि स्कूल-कॉलेज जाओ, पढ़ाई करो और फिर कोई एक नौकरी हासिल कर अपनी गृहस्थी में बस जाओ। आध्यात्मिकता का उनके जीवन में कोई खास स्थान नहीं था। आम तौर पर मुंबई में लोग अक्सर सिद्धिविनायक या महालक्ष्मी मंदिर जाया करते हैं लेकिन, हमारे माता-पिता ऐसा बेहद कम करते थे। जब मेरी पहली किताब छपी, तब भी वे इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हो पा रहे थे कि आध्यात्मिकता पर लेखन या बातचीत करना कोई कॅरिअर हो सकता है। मेरी रुचियां उन्हें थोड़ी विचित्र लगती थीं। मैं वेद-पुराण-आस्था से जुड़ी किताबें खरीदता तो वे हैरत से देखते। थिएटर, आर्ट, म्यूज़िक, म्यूज़ियम – उनके संसार से इतर बातें थीं। हालांकि, उन्हें ये तो अहसास था कि हमारा बेटा थोड़ा अलग किस्म का है, लेकिन मध्यवर्गीय अभिभावकों की दृष्टि पढ़ाई, नौकरी, शादी तक सिमट जाती है। उनकी दुनिया वहीं तक रही। हालांकि, जब आपने तय कर लिया हो कि जीवन में क्या करना है तो स्वीकार या नकार से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता।


मैं मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था, उससे पहले ही अध्यात्म में गहरी रुचि पैदा हो गई थी। इसी के चलते मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने बॉम्बे यूनिवर्सिटी में शुरू हुए कम्परेटिव मायथोलॉजी कोर्स में दाखिला ले लिया। वैसे, तब के अध्यापक अब मिलते हैं तो कहते हैं –"देवदत्त, तुम्हें तब भी हमसे ज्यादा आता था।" वैसे, काफी हद तक यह सच है। किताबों के साथ के चलते मेरी जानकारी एडवांस लेवल तक पहुंच गई थी, जबकि कोर्स में बेसिक बातें बताई जा रही थीं।


मेडिकल की पढ़ाई करने के बाद मैंने फार्मा इंडस्ट्री ज्वाॅइन कर ली थी। मैं तकरीबन 20 साल का था, तब ये रास्ता चुना कि फार्मा की आमदनी से घर चलाते रहेंगे और अध्यात्म का चिंतन-अध्ययन-लेखन मन के लिए करेंगे। बहुत-सी पत्रिकाओं के लिए मैं विभिन्न विषयों पर लेखन करने और ड्राइंग बनाने लगा था। एक बार मेरे एक संपादक ने कहा, "तुम्हारे लेखन में आध्यात्मिकता का प्रभाव साफ नज़र आता है। तुम्हें इस पर फोकस करना चाहिए।’"
मैंने उनकी सलाह पर अमल किया और यह प्रयोग काफी सफल रहा। 1986 की बात है, एक परिचित महिला ने कहा कि शिव पर एक पुस्तक प्रकाशित करने की इच्छा है। मैंने बगैर किसी अतिरिक्त प्रयास के वो किताब लिख डाली। उन्होंने तारीफ करते हुए कहा, ये किताब तुम्हारे अंदर ही कहीं बह रही थी। ऐसी टिप्पणियों से मेरा हौसला काफी बढ़ गया। चूंकि पढ़ाई के लिए अक्सर डायग्राम बनाने पड़ते थे, ऐसे में धीरे-धीरे हाथ सध गया था। फ्री-लांसिंग के दिनों में मैंने एक चर्चित पत्रिका के लिए काफी काम किया। वो पत्रिका अपने बोल्ड कंटेंट के लिए खूब लोकप्रिय थी, लेकिन उसके संपादक के व्यक्तित्व का एक और पक्ष था कि वे नए लेखकों को खूब मौके और प्रयोग करने की छूट देते थे। पहले प्रकाशक को मेरी ड्राइंग मॉडर्न लगी और वे उसे छापने को लिए उत्सुक नहीं रहे, लेकिन बाद के प्रकाशकों-संपादकों ने इसे एक्सप्लोर किया। बिहैवियरल साइंस को समझने का जब मुझे मौका मिला तो जीवन में एक और दरवाजा खुल गया। मैंने देखा कि बड़ी कंपनियों के प्रबंधन और कर्मचारी अलग-अलग किस्म के उलझावों में घिरे रहते हैं, उन्हें मायथोलॉजी के उदाहरणों से सही रास्ता दिखाया जा सकता है। ज्ञान की गंगा ज़िंदगी को लेकर उनका नज़रिया बदल सकती है।


फार्मा इंडस्ट्री में काम करते समय किसी मेडिकल प्रॉब्लम को सरल भाषा में डॉक्टर या रोगी को समझाने का मेरा अभ्यास ही बाद में आध्यात्मिकता की जटलिताओं और गूढ़ शब्दावलियों को भेदने में काम आया। लोगों ने अध्यात्म को जटिल बना दिया है। सच तो ये है कि एकेडेमिक पढ़ाई के नुस्खों को मैंने मैथालॉजी के सूत्र हल करने में इस्तेमाल किया। मेरा मानना है कि हर चीज में कुछ तो कॉमन होता है। वही कॉमन संबंध तलाश लेने की ज़रूरत है। मैंने बहुत-सी अंतरराष्ट्रीय स्तर की कंपनियों में काम किया है, वहां अलग तरह का अनुशासन सीखा, व्यवस्थित हुआ। फ्यूचर ग्रुप में आने के बाद एक नई बात जानी कि पाश्चात्य नज़रिये का ज्ञान भारत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। जाहिर है कि तमाम रास्तों से गुजरकर, खुद को लगातार बदलते हुए मैंने स्वयं को ज्ञान और प्रबंधन को मोर्चे पर मज़बूती दी, लेकिन अपनी रुचि का दामन कभी नहीं छोड़ा।


मैंने यह भी महसूस किया कि भूगोल से इतिहास बनता है और इतिहास से आध्यात्मिक विचार बनते-मज़बूत होते हैं। गंगा तट के किनारे सनातन धर्म विकसित हुआ है तो इस धर्म की बुनियादी चीजें नदी से प्रभावित होती हुई पाएंगे। यही नहीं, मुंबई के लड़के का धार्मिक चिंतन और उत्तर भारत के किसी गांव के युवक की वैचारिकी में फर्क मिलेगा। यहां तनाव खूब है, वहीं सिस्टम और डिसिप्लिन भी है, लेकिन दिल्ली में शायद कुछ अलग तरह की व्यवस्था देखने को मिलेगी। व्यवस्थित होकर भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान का संतुलित अध्ययन करके ही आप धर्म समझ सकते हैं। जैसे तमाम नदियों की धाराएं मिलकर नई नदी बन जाती है, ऐसे ही जीवन, समाज की समझदारी, तमाम विषयों के संतुलित अध्ययन से ही धर्म की विविधता को एकसार होते हुए समझा जा सकता है। हालांकि ये ध्यान रखना होगा कि इतिहास जब बदलता है तो विचार भी परिवर्तित होते हैं। यही बदलाव चिंतन के नए दरवाज़े खोलता है।

(जैसा मायथोलॉजिस्ट और लेखक देवदत्त पटनायक ने मुंबई में चंडीदत्त शुक्ला को बताया।)

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