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भारतीय स्टार्टअप एंट्रोपिक ने बनाया लोगों की भावनाओं को समझने वाला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म

एंट्रोपिक सिर्फ दो साल पुरानी कंपनी है, लेकिन अपनी खोज की बदौलत उसने निवेशकों से 7.5 करोड़ रुपए जुटाए हैं

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jul 30, 2018, 11:46 AM IST

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    भारतीय स्टार्टअप एंत्रोपिक ने प्रोजेक्ट के लिए निवेशकों से 7.5 करोड़ की फंडिंग हासिल की।

    बेंगलुरु. यहां की एक स्टार्टअप एंट्रोपिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल इंसानों की भावनाओं को समझने में कर रही है। हाल ही में इसने इन्वेस्टरों के समूह से 11 लाख डॉलर की (7.5 करोड़ रुपए) फंडिंग हािसल की है। महज दो साल पहले शुरू हुई एंट्रोपिक टेक ने इमोशन एआई का यह इनोवेटिव प्रयोग किया है।
    एंट्रोपिक पहली कंपनी है जो 100 मिलियन डॉलर (करीब 700 करोड़ रुपए) के भारत इनोवेशन फंड पोर्टफोलियो में शामिल है। दुनियाभर में 50 से ज्यादा कंपनियां इसकी सेवाएं ले रही हैं। एंट्रोपिक टेक के फाउंडर व सीईओ रंजन कुमार बताते हैं कि ग्राहक के रूप में हमारी खरीदारी से जुड़े बहुत से के फैसले काफी हद तक भावनाओं से प्रभावित होते हैं। इंसान की इसी प्रकृति को हमने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म के जरिए समझने की कोशिश की है।

    चेहरा, आई मूवमेंट, दिमागी तरंगों के जरिए समझता है प्रतिक्रिया:एंट्रोपिक टेक का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म एसएएएस अफैक्ट लैब 2.0 'इमोशन एआई' लोगों की भावनाओं को समझता है। साथ ही उनकी इच्छाओं और अवचेतन (सब कॉन्शस) की प्रतिक्रियाओं को भी मापता है। इसके लिए यह प्लेटफॉर्म हर चेहरे की अभिव्यक्ति, दिमागी तरंगों, आंखों की मूवमेंट आदि को ट्रैक कर सब कॉन्शस की विभिन्न अ‌वस्थाओं को समझता है।
    कंपनी के संस्थापक और सीईओ रंजन कुमार ने बताया, 'मान लीजिए आप कोई फिल्म देख रहे हैं। फिल्म के अलग-अलग हिस्सों के दौरान जब आप खुश होते हैं, दुखी होते हैं या हैरानी जताते हैं, तो यह आपके चेहरे से आपकी भावनाओं को पढ़ता है। खरीदारी में आपको क्या पसंद है और क्या नहीं, यह देखने में यही टेक्नोलॉजी अपनाई जाती है।' कुल मिलाकर एंट्रोपिक टेक का अफैक्ट लैब कंपनियों को किसी विशेष प्रोडक्ट, कंटेंट या सर्विस पर ग्राहकों की प्रतिक्रिया समझने में मदद करता है। इनमें एडवर्टाइजमेंट, फिल्मों के ट्रेलर और प्रमोशनल वीडियो भी शामिल हैं।

    कैसे अलग है: ज्यादातर मार्केटिंग एनालिटिक्स सर्विस ग्राहकों के ब्राउजिंग पैटर्न और फीडबैक फॉर्म पर दी गई प्रतिक्रियाओं पर आधारित होते हैं। जबकि एंट्रोपिक टेक यूजर के सब कॉन्शियस पर फोकस रखती है, जो उनके फैसला लेने में 95% भूमिका निभाता है। यह सॉल्यूशन न्यूरोसाइंस, अफेक्टिव कंप्यूटिंग, मशीन लर्निंग और कंज्यूमर रिसर्च आधारित है। इस प्रोजेक्ट के लिए एंट्रोपिक को आईआईएम-ए के सेंटर फॉर इनोवेशन, इन्क्यूबेशन एंड इंटर्नशिप के भारत इनोवेशन फंड के अलावा आईसीआईसीआई लोम्बार्ड, फिलिप्स, बजाज इलेक्ट्रिकल्स, आरबीएल बैंक व सिडबी के फंड ऑफ फंड्स से मदद मिली।


    किलर रोबोट के विरोध में 90 देशों के 2,500 एक्जीक्यूटिव ने शपथ ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हर क्षेत्र में हो रहा है। इसलिए इससे जुड़े खतरे भी हैं। इसी को समझते हुए अमेरिका के फ्यूचर ऑफ लाइफ इंस्टीट्यूट ने एक अभियान शुरू किया है, जिसमें टेक दिग्गज कंपनियों से जुड़े लोगों को साइन करके शपथ दिलावाई गई है। 90 देशों की 160 कंपनियों के 2,500 से ज्यादा टेक आंत्रप्रेन्योर, इंजीनियर्स और एक्सपर्ट्स इस प्लेज में शामिल हुए। इसमें इन्होंने कहा है कि वे किलर रोबोट या जानलेवा हथियारों से जुड़े किसी भी प्रोजेक्ट में शामिल नहीं होंगे, न ही मदद देंगे। इस प्लेज में गूगल की डीपमाइंड के फाउंडर शेन लेग, स्काइप के फाउंडर जान टॉलिन और एआई रिसर्च से जुड़े स्टुअर्ट रसेल, योशुआ बेंजिओ व इलोन मस्क ने साइन किए हैं। कुछ दिनों पहले गूगल ने भी अपने कर्मचारियों के विरोध पर ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट में मदद देने से इनकार कर दिया था। दुनियाभर में बढ़ती जानलेवा हथियारों की दौड़, किलर रोबोट टेक्नोलॉजी पर रोक के लिए यह पहल की है। यह इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अगस्त में यूएन इसी तरह के हथियारों पर बैठक करने जा रहा है।

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