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IVF ने कई कपल्स की जिंदगी को भर दिया खुशियों से

40 सालों में IVF यानी इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन के जरिए अब तक 80 लाख से भी ज्यादा बेबी पैदा हो चुके हैं।

Dainik Bhaskar

Aug 29, 2018, 12:08 PM IST
IVF filled the life of many couples with happiness

बीते 40 सालों में IVF यानी इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन के जरिए अब तक 80 लाख से भी ज्यादा बेबी पैदा हो चुके हैं। इसने उन दंपतियों को भी खुशियां दी हैं, जो सारी उम्मीदें छोड़ चुके थे। यहां हम 6 केस स्टडीज के जरिए बता रहे हैं ऐसे ही दंपतियों की कहानी। पहचान छिपाने के लिए नाम बदल दिए गए हैं।

केस स्टडी 1

शादी के 10 साल बाद बने माता-पिता

श्यामली (37 साल) और कार्तिकेयन (43 साल) की 10 साल पहले 2008 में शादी हुई थी। साल 2011 में श्यामली नैचुरली कंसिव हुई, लेकिन उनका बच्चा प्रीटर्म लैबर की दिक्कतों के चलते जीवित नहीं रहा। उन्होंने एक हॉस्पिटल में दो बार IUI करवाई, लेकिन वह फेल हो गई। फिर उनकी डिटेल हिस्ट्री की समीक्षा करने के बाद वहां की डॉक्टर ने उन्हें IVF करवाने की सलाह दी।

दंपती की साइकोलॉजिकल काउंसिलिंग के दौरान पाया गया कि कार्तिकेयन सिजोफ्रोनिक है। सिजोफ्रोनिक व्यक्ति थोड़ा कन्फ्यूज होता है और किसी चीज पर कॉन्सेनट्रेट नहीं कर पाता है। इस वजह से उस पर दवाइयों का असर नहीं हो पा रहा था। पति थोड़ा डिप्रेस्ड भी था जिससे कंसीव करने में मुश्किल हो

रही थी। श्यामली भी काफी स्ट्रेस में थी, क्योंकि उसमें फॉलिक्यूलर ग्रोथ नजर नहीं आ रही थी। इसलिए उसे मनोचिकित्सकीय काउंसिलिंग दी गई ताकि वह अपनी भावनाएं शेयर कर सकें। उसे डीप ब्रीदिंग रिलेक्सेशन टेकनीक के जरिए रिलेक्स किया गया। लगातार काउंसिलिंग सेशन से श्यामली अपनी एनजाइटी और स्ट्रेस का सामना करने को तैयार हो गई थी। इसके लिए उसे अपने पति के उतने ही सपोर्ट की जरूरत पड़ी, जितना जरूरी था। काउंसिलिंग का नतीजा यह रहा कि उसमें जल्दी ही फॉलिक्यूलर ग्रोथ नजर आने लगी। आसानी से उसका भ्रूण (एम्ब्रयो) का ट्रांसफर हो गया और वह पहले ही प्रयास में प्रेग्नेंट होने में सफल रही।

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केस स्टडी 2

सुसाइड का सोच लिया था, फिर बनी जुड़वां बच्चों की मां

28 साल की हेमलता नेपाल से तीसरे IVF ट्रायल के लिए नोवा हॉस्पिटल आईं। उसने कंसलटेंट से मुलाकात की। वह काफी स्ट्रेस में थी। इसलिए स्ट्रेस को दूर करने के लिए उसे जल्दी ही काउंसलिंग रूम में भेज दिया गया। काउंसलर ने उसे कंफर्ट किया और उन विचारों का सामना करने के लिए मार्गदर्शन दिया जिनकी वजह से वे तनाव झेल रही थी। उसने तो यहां तक का सोच लिया था कि अगर इस बार वे मां नहीं बन पाई तो आत्महत्या कर लेगी। नोवा के स्टॉफ ने बाद में पड़ताल की तो पता चला कि हेमलता जिस कम्युनिटी में रहती है, वहां अगर पत्नी मां नहीं बन सकती तो उसका पति बच्चे के लिए दूसरा विवाह भी कर सकता है।

हेमलता की शादी को 8 साल हो चुके थे। वह इस बात से बहुत चिंतित थी कि उसका पति दूसरी शादी कर लेगा और उसे घर से बाहर निकाल दिया जाएगा। उसकी आईवीएफ यात्रा के दौरान उसे कई मनोचिकित्सकीय थेरेपेटिक सलाह दी गई। काउंसिलिंग के कई सेशन किए गए।

अंतत: आईवीफ का तीसरा प्रयास सफल रहा। 19 मई 2017 को नेपाल में उसने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। पेशेंट के साथ नोवा टीम लगातार संपर्क में रही। उसे सतत मार्गदर्शन देते रही।

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केस स्टडी 3

कैंसर के उपचार से पहले ही भ्रूण को रख लिया गया सुरक्षित

दिपाली को केवल 27 साल की उम्र में नॉन-हॉजकिन्स लिम्फोमा हो गया था जो इम्युन सिस्टम पर असर डालता है। उसकी तीन महीने पहले ही शादी हुई थी। दिपाली और उसके पति राजेश शादी के बाद से ही बच्चा चाहते थे। इसलिए किमियोथेरेपी और रेडियोथेरेपी से पहले दिपाली को अपने एम्ब्रयो (भ्रूण) को फ्रीज करने की सलाह दी गई। दिपाली के अंडों और राजेश के शुक्राणुओं का इस्तेमाल कर 6 भ्रूण बनाए गए। इन्हें क्रॉयोप्रीजरवेशन के जरिए कैंसर के उपचार के बाद यूज करने के लिए सुरक्षित रख लिया गया। कैंसर का उपचार करीब तीन साल तक चला। करीब 30 साल की उम्र में दिपाली कैंसर से मुक्त हुई। अब दिपाली और राजेश ने फैमिली बढ़ाने का निर्णय लिया। चूंकि दिपाली और राजेश ने पहले ही भ्रूण सुरक्षित रख लिए थे। इसलिए वे कंसीव करने में सफल रही।

अगर किसी युवा पुरुष या महिला को कैंसर हुआ है तो उसे एग, स्पर्म या एम्ब्रयो फ्रीजिंग की सलाह दी जानी चाहिए। कैंसर का पता चलते ही सिंगल वीमेन oocytes (रिप्रोडक्शन में इनवॉल्व सेल) को फ्रीज करवा सकती है। शादीशुदा महिलाएं एम्ब्रयोज या फिर ऑवेरियन टिश्यू को फ्रीज करवा सकती हैं। इसी तरह पुरुष अपने स्पर्म को फ्रीज करवा सकते हैं। कैंसर के खत्म होने के बाद इनफर्टिलिटी की दशा में असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) के जरिए महिलाएं मां बन सकती हैं।

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केस स्टडी 4

कम उम्र में ही एग्स बनने बंद हो गए थे, तो डोनर एग्स से बनी मां

माला उसी तरह की जिंदगी जी रही थी, जैसी कि सामान्य महिलाएं जीती हैं। 14 साल की उम्र में उनके पीरियड्स शुरू हुए थे और 24 साल की उम्र तक वे रेग्युलर रहे। फिर धीरे-धीरे उनके पीरियड्स अनियमित होने लगे। काफी समय के बाद उन्होंने गायनेकॉलोजिस्ट को कंसल्ट किया जिसने पीरियड्स को नियमित करने के लिए दवाइयां देनी शुरू की। धीरे-धीरे हॉर्मोन्स पर उनकी निर्भरता बढ़ती गई। 27 साल की उम्र तक तो उनकी हॉर्मोन्स दवाइयों पर निर्भरता इतनी बढ़ गई कि बगैर दवाइयों के उन्हें पीरियड्स नहीं होते थे। सभी हॉर्मोन टेस्ट अर्ली मेनोपॉज की ओर इशारा कर रहे थे।

माला अब 29 साल की हैं। पांच साल पहले मनीष के साथ उनकी शादी हुई थी। उनकी इस स्थिति के कारण माला नैचुरली गर्भधारण नहीं कर सकती थीं। इसलिए उन्हें आईवीएफ के जरिए डोनर एग्स से इनफर्टिलिटी ट्रीटमेंट लेना पड़ा।

प्रीमेच्योर ओवेरियन फैल्योर (POF) में अंडाशय में एग्स/फॉलिकल्स का बनना बंद हो जाता है। द इंस्टीटयूट फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज (ISEC) द्वारा की गई एक स्टडी के अनुसार करीब 4 फीसदी भारतीय महिलाओं में 29 से 34 साल की उम्र के बीच ही मेनोपॉज के संकेत दिखने लगते हैं। 35 से 39 साल की 8 फीसदी महिलाओं में मेनापॉज की संभावना नजर आने लगती है। आमतौर पर एक सामान्य महिला 46 से 52 साल की उम्र में मैनोपॉज पर पहुंचती है। लेकिन यह आश्चर्य ही है कि आज 30 साल की उम्र की युवा महिलाएं भी प्रीमेच्योर ओवेरियन फैल्योर से ग्रस्त हो रही हैं।

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केस स्टडी 5

पति में शुक्राणु न होने के कारण डोनर स्पर्म से बन सके माता-पिता

सरिता (29 साल) की शादी को तीन साल हो गए थे, लेकिन वे मां नहीं बन पाई थी। सरिता ने अपना फर्टिलिटी टेस्ट करवाया तो उनकी सारी रिपोर्ट्स नॉर्मल आईं। तब उनके पति रमेश (32) ने अपनी जांच करवाई। उनकी जांच रिपोर्ट से पता चला कि उनके सीमेन में कोई स्पर्म नहीं था। मेडिकल की भाषा में इसे Azoospermia कहते हैं। हालांकि रमेश बाकी पूरी तरह से तंदुरुस्त थे। इनफर्टिलिटी से कोई भी, महिला या पुरुष, प्रभावित हो सकता है। ऐसे में इनफर्टिलिटी को केवल महिलाओं की समस्या मानना सबसे बड़ा मिथक है।

मेल इनफर्टिलिटी में ICSI (Intracytoplasmic Sperm Injection) सबसे कॉमन और प्रभावी ट्रीटमेंट है जिसमें सिंगल स्पर्म को मैच्योर एग में सीधे ही इन्जेक्ट किया जाता है। एडवांस्ड ART टेक्नीक्स जैसे मैग्नेटिक एक्टीवेटेड सेल सार्टिंग (MACS) से ICSI के लिए बेस्ट स्पर्म को चुनने में मदद

मिलती है।

सरिता और रमेश डोनर स्पर्म और ICSI की मदद से कंसीव करने में सफल रहे।

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केस स्टडी 6

बार-बार आ रहे थे निगेटिव रिजल्ट, टूट गया था मनोबल

रेखा (31 साल) और श्याम (39 साल) को शादी के 9 साल तक कोई बच्चा नहीं हो पाया था। इसलिए इन्होंने 2016 में एक फर्टिलिटी सेंटर में जाने का निश्चय किया। इन्होंने एक बार IVF करवाया था, लेकिन सफल नहीं हुआ था। पति की टेस्टीक्यूलर फैल्योर की हिस्ट्री थी। टेस्टीक्यूलर फैल्योर में पुरुषों के अंडकोश में शुक्राणु और टेस्टोस्टीरोन हॉर्मोन बनना बंद हो जाते हैं। दोनों काफी निराश हो चुके थे। माता-पिता नहीं बन पाने के लिए दोनों खुद को जिम्मेदार मानते थे। इसलिए और उपचार करवाने को लेकर तनाव में थे। दंपती को इमोशनल और क्लीनिकल सपोर्ट के साथ AID-IVF साइकल की सलाह दी गई थी। लेकिन निगेटिव प्रेग्नेंसी रिजल्ट के कारण दंपती और परिवार की उम्मीदें चकनाचूर हो गईं। डॉक्टर और कांउसलर ने दंपती की काउंसिलिंग शुरू की। दुर्भाग्य से इस कपल के लिए एक और साइकल निगेटिव आ गया। ऐसे में उन्हें IVF-OD के बाद ERA (एंडोमीट्रायल रिसेप्टिव अरे) की सलाह दी गई। कपल कोई निर्णय ले सके, इसके लिए उनकी फिर काउंसिलिंग की गई। आखिर वे एक और प्रयास करने के लिए सहमत हो गए। लगातार मिल रही

सहायता वे आशावादी हो गए थे। और फिर कपल के चेहरे पर मुस्कान आई, जब उनके हाथों में पॉजिटिव रिपोर्ट आई।

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इन 5 वजहों से हो सकती है महिलाओं में इनफर्टिलिटी

1. पीसीओडी

मायो क्लीनिक की एक स्टडी के अनुसार महिलाओं में इनफर्टिलिटी की सबसे बड़ी वजह है पीसीओडी यानी पोलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम। इसका फीमेल हॉर्मोन्स पर असर पड़ता है। इससे अंडे बनने की प्रोसेस अनियमित हो जाती है जो इनफर्टिलिटी की वजह बनती है।

2. टीबी

महिलाओं में कई बार टीबी की वजह से फैलोपिन ट्यूब ब्लॉक हो जाती है। इस वजह से महिलाएं प्रेग्नेंट नहीं हो पातीं।

3. मोटापा

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार मोटापा भी महिलाओं में इनफर्टिलिटी की एक बड़ी वजह हो सकता है।

4. स्ट्रेस

जनरल ह्यूमन प्रोडक्शन की एक रिपोर्ट के अनुसार लगातार स्ट्रेस में रहने वाली महिलाओं में इनफर्टिलिटी के चांस बढ़ जाते हैं।

5. थाइरॉइड

महिलाओं में हाइपर थाइराॅइड भी इनफर्टिलिटी की एक वजह हो सकती है।

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आईवीएफ से पहले की तैयारी

महिलाओं के टेस्ट

- अंडों की संख्या और गुणवत्ता को जांचने के लिए फॉलिकल स्टिम्युलेटिंग हॉर्मोन, एंटिमुलेरियन हॉर्मोन और एस्ट्रोजन टेस्ट किए जाते हैं।

- फर्टिलिटी दवाओं के प्रभाव की जांच के लिए अंडाशय की सोनोग्राफी की जाती है।

- यह देखने के लिए गर्भाशय की जांच की जाती है कि वह भ्रूण को संभालने के लिए तैयार है या नहीं।

पुरुषों के टेस्ट

पुरुषों में शुक्राणु परीक्षण किया जाता है जिसमें शुक्राणुओं की संख्या, उनकी गतिशीलता और आकार की जांच की जाती है। अगर परिणाम नॉर्मल आता है तो डॉक्टर आईवीएफ की मंजूरी देते हैं।

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