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राज्याभिषेक के दौरान ऐसा क्या हुआ, जिसे देख डर गए थे युधिष्ठिर?

महाभारत के शांति पर्व के अनुसार, युद्ध में जीतने के बाद पांडवों ने ऋषि-मुनियों की बात मानकर हस्तिनापुर में प्रवेश किया।

Danik Bhaskar | Jul 12, 2018, 04:32 PM IST

रिलिजन डेस्क। महाभारत की कथा जितनी रोचक है, उतनी ही रहस्यमयी भी है। बहुत सी ऐसी बातें हैं जिसके बारे में आमजन नहीं जानते। कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया, ये बात तो सभी जानते हैं, लेकिन राज्याभिषेक के दौरान क्या हुआ और उसके बाद युधिष्ठिर ने किसे क्या काम सौंपा, ये बात बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको वही बता रहे हैं...


ये हुआ था राज्याभिषेक के दौरान
- महाभारत के शांति पर्व के अनुसार, युद्ध में जीतने के बाद पांडवों ने ऋषि-मुनियों की बात मानकर हस्तिनापुर में प्रवेश किया।
- जिस समय युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो रहा था, उसी समय चार्वाक नाम का एक राक्षस ब्राह्मण के वेष में आया और युधिष्ठिर से कहने लगा कि तुमने अपने बंधु-बांधवों की हत्या कर यह राज्य प्राप्त किया है। इसलिए तुम पापी हो।
- ब्राह्मण के मुंह से ऐसी बात सुनकर युधिष्ठिर बहुत डर गए। ये देखकर दूसरे ब्राह्मणों ने युधिष्ठिर से कहा कि हम तो आपको आशीर्वाद देने आए हैं। यह ब्राह्मण हमारे साथ नहीं है।
- महात्माओं ने अपनी दिव्य दृष्टि से उस ब्राह्मण का रूप धरे राक्षस को पहचान लिया और कहा कि यह तो दुर्योधन का मित्र राक्षस चार्वाक है। ये यहां पर शुभ कार्य में बाधा डालने के उद्देश्य से आया है।
- इतना कहकर उन महात्माओं ने अपनी दिव्य दृष्टि से उस राक्षस को भस्म कर दिया। यह देख युधिष्ठिर ने उन सभी महात्माओं की पूजा कर उन्हें प्रसन्न किया। इसके बाद विधि-विधान से युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ।

किसे क्या जिम्मेदारी सौंपी युधिष्ठिर ने

- राज्याभिषेक होने के बाद युधिष्ठिर ने भीम को युवराज के पद पर नियुक्त किया। विदुरजी को राजकाल संबंधी सलाह देने का, निश्चय करने का तथा संधि, विग्रह आदि छ: बातों का निर्णय लेने का अधिकार दिया गया।
- सेना की गणना करना, उसे भोजन और वेतन देने का काम नकुल को दिया गया। शत्रु के देश पर चढ़ाई करने तथा दुष्टों को दंड देने का काम अर्जुन को दिया गया।
- ब्राह्मण और देवताओं के काम पर तथा पुरोहिती के दूसरे कामों पर महर्षि धौम्य नियुक्त हुए। सहदेव को युधिष्ठिर ने अपने साथ रखा।
- विदुर, संजय और युयुत्सु से कहा कि तुम हमेशा राजा धृतराष्ट्र की सेवा में रहना और उन्हीं की आज्ञा की पालन करना। इस प्रकार युधिष्ठिर ने अन्य लोगों को भी उनके सामर्थ्य के अनुसार अलग-अलग काम सौंप दिए।

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