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सीएचबी: कोर्ट में दिए एफिडेविट में कुछ कहा और रिपोर्ट कुछ और दी, आरटीआई में खुलासा

3 वर्ष पहले
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चंडीगढ़.  किसी कंपनी को फेवर करने के लिए अफसर किस तरह से फैक्ट्स के साथ छेड़छाड़ करते हैं, इसका उदाहरण सीएचबी में देखने को मिला है। टॉयलेट ब्लॉक्स पर लगने वाली एडवर्टाइजमेंट से जुड़े टेंडर को अलॉट करने के मामले में सीएचबी के अफसरों ने कागजों के साथ छेड़छाड़ कर गुमराह किया, ताकि पूरा मामला टेंडर ले चुकी सेलवेल कंपनी के फेवर में चला जाए। मामले का खुलासा राइट टू इंफॉर्मेशन एक्ट के तहत मिले कागजों से हुआ। अब फाइनेंस सेक्रेटरी कम चेयरमैन हाउसिंग बोर्ड अजॉय कुमार सिन्हा ने 18 मई को इसकी जांच के ऑर्डर कर दिए हैं। जांच का जिम्मा बोर्ड के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (सीईओ) हरीश नैयर को सौंपा गया है।

 

सीईओ के ऑर्डर पर चेयरमैन को किया गुमराह

- सीएचबी के पूर्व सीईओ एसबी दीपक कुमार ने 30 अक्टूबर 2015 को सेलवेल कंपनी को डीबार किया। कारण दिया कि सेलवेल कंपनी पर सीबीआई ने केस दर्ज कर रखा है और यह बात कंपनी ने टेंडर के समय बोर्ड को नहीं बताई।

-  इस ऑर्डर के खिलाफ कंपनी नवंबर 2015 में हाईकोर्ट चली गई। हाईकोर्ट में सीएचबी की ओर से कहा गया कि कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना सही था, क्योंकि उसके खिलाफ केस दर्ज है। सुनवाई के दौरान ही कंपनी ने 24 फरवरी 2016 को केस कोर्ट से विदड्राॅ करके अपील सीएचबी चेयरमैन के पास लगा दी। इसके बाद गड़बड़ी शुरू हुई। 

 

गलती नंबर-1

चीफ इंजीनियर राजीव सिंगला व लॉ ऑफिसर गुरप्रीत सिंह ने तत्कालीन चेयरमैन मनिंदर बैंस को बताया ही नहीं कि सीएचबी के तत्कालीन चीफ इंजीनियर सुनील कुमार ने कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा कि ब्लैकलिस्ट करना सही है, क्योंकि कंपनी पर सीबीआई ने केस दर्ज कर रखा है। इसके उलट चीफ इंजीनियर और लॉ ऑफिसर ने चेयरमैन को यह लिख दिया कि ब्लैक लिस्टिंग गलत की गई।

 

गलती नंबर-2 कोर्ट में सीएचबी के अफसरों ने कहा कि कंपनी को 17 अप्रैल 2015 को शोकॉज नोटिस दिया, लेकिन बाद में चेयरमैन के सामने अपील के दौरान कह दिया कि कंपनी को शोकॉज नोटिस नहीं दिया गया। चेयरमैन को गुमराह करने का फायदा कंपनी को मिला और चेयरमैन ने मार्च 2016 में अपने ऑर्डर में एंट्रिम स्टे देते हुए लिखा कि मामला पेंडिंग रहेगा यानि टेंडर चलता रहेगा। 

 

दो साल से मामला पेंडिंग, चेयरमैन ने भी एक्शन नहीं लिया

- चेयरमैन के ऑर्डर के बाद 26 मई 2016 को सीएचबी की मीटिंग में यह मामला सामने आया। बोर्ड ने भी यह फैसला दिया कि चेयरमैन के ऑर्डर के हिसाब से मामला पेंडिंग ही रहेगा। अब पिछले दो साल से यह मामला पेंडिंग है और इस पर कोई फैसला नहीं लिया गया है।

-  यह टेंडर कुल 5 साल का है और इसमें से दो साल तो मामला पेंडिंग होने की वजह से निकल चुके हैं। कंपनी बे-रोक टोक अपना काम करती जा रही है। झूठी रिपोर्ट देने वालों पर भी कोई कार्रवाई नहीं गई।

 

 

दो साल से जमा नहीं हुई एडवर्टाइजमेंट फीस

- टेंडर की शर्तों के हिसाब से एडवर्टाइजमेंट फीस जमा होनी चाहिए थी, लेकिन पिछले दो साल से एक रुपया भी जमा नहीं हुआ। 7 पब्लिक टॉयलेट्स का यह टेंडर 5 सालों के लिए साढ़े तीन करोड़ रुपए में अलॉट हुआ था।

- 6 लाख रुपए प्रति साल की एडवर्टाइजमेंट फीस के हिसाब से 12 लाख रुपए और ब्याज जोड़कर 15 लाख रुपए अभी तक कंपनी ने जमा नहीं करवाए हैं। खासबात है कि सीएचबी ने कंपनी को शोकॉज नोटिस तक नहीं दिया कि पैसा क्यों जमा नहीं करवाया जा रहा है।

 

 

फैक्ट्स चेक कर रहे

सीएचबी के फाइनेंस सेक्रेटरी कम चेयरमैनअजॉय कुमार सिन्हा के मुताबिक, यह मामला सेंसेटिव है और मेरे टेन्योर से पहले का है। मैंने सीएचबी सीईओ काे जांच का जिम्मा सौंपा है, ताकि वह सारे फैक्ट्स चेक करके एक्शन रिकमेंड करें। 

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