खगेंद्र जी के नाम के साथ स्मृतिशेष जोड़ना बेहद अटपटा

News - खगेंद्र जी के नाम के साथ स्मृतिशेष जोड़ना बेहद अटपटा लग रहा है। लेकिन, वक्त और सच्चाई दोनों कभी बेरहम बन जाते हैं।...

Jan 16, 2020, 07:50 AM IST
Ranchi News - it is very strange to add a reminder to khagendra ji39s name
खगेंद्र जी के नाम के साथ स्मृतिशेष जोड़ना बेहद अटपटा लग रहा है। लेकिन, वक्त और सच्चाई दोनों कभी बेरहम बन जाते हैं। उनकी सोच-संवेदना का दायरा एकेडमिक विषयों तक सिमटा नहीं था। समाज, दर्शन, संस्कृति, इतिहास, साहित्य और जीवन के आरपार पसरी थीं उनकी चिंताएं। व्यक्ति, परिवार और सामाजिक सरोकारों से जुड़े तमाम मुद्दों के रेशों और जलते सवालों पर उनकी गहरी नजर थी। उनके नजरिए में डिबेटी अंदाज नहीं झलकता था, तर्क और निष्ठा की साझेदारी के साथ विवेक की भागीदारी उन्हें गरिमा देती थी। उनके कर्मसंकुल और कार्यव्यस्त जीवन में दायित्व का मानक उन्हें निर्देशित करता रहा। उन्होंने क्या किया और क्या-क्या किया, इसकी पड़ताल जब शुरू होगी तो उनके कई जाने-अनजाने पहलू ब्योरेवार सामने आ सकते हैैं। फिलहाल दोटूक बात यह है कि उनके शब्द संसार और संस्थागत योगदान की समीक्षा अभी शुरू नहीं हुई और उनके कृतित्व का सम्यक मूल्यांकन यह तय करेगा कि अपने समय-परिवेश में उनका हस्तक्षेपी दखल कैसा और कितना रहा। सच यह भी है कि किसी प्रतिष्ठान के शीर्ष पर बैठ कर सुविधाओं के बीच कलम के करतब दिखाने का सुयोग उन्हें नहीं मिला। सच है कि विश्वविद्यालय, मीडिया या संस्था प्रमुख रह कर उन्होंने अपने यश का कोई कीर्तिमान नहीं बनाया था। यह रास्ता उनकी मनोरचना के मेल में नहीं आता था। जानीमानी बात है कि यात्राओं के अटूट सिलसिले के बीच उनकी शब्द-यात्रा जारी रही, सांगठनिक हलचलों, गोष्ठियों-संगोष्ठियों-आंदोलनों में बेमिसाल शिरकत ने उनके संघर्ष को धार और दिशा दी। हिंदी की लगातार बड़ी होती दुनिया में सृजन, विचार और आचार के संयोग के लिहाज से वेे अपने ढंग के अकेले शब्दकार हुए।

उन पर लिखने के लिए भरपूर समय और धीरज चाहिए। बेशक, जल्दबाजी में लिखी गई फतवा जैसी कोई टिप्पणी बहुत अर्थ नहीं रखती। इन पंक्तियों का लेखक अपनी इस सीमा से परिचित है। फिलहाल यह जोड़ना जरूरी लग रहा है कि मैं उनके बहुत समीपी लोगों में कभी नहीं रहा। लिहाजा उनके विगत का ब्योरेवार लेखाजोखा देते हुए संस्मरण लिखने की कोई बड़ी पूंजी अपने पास नहीं दिखती। इसके बावजूद उनके व्यक्तित्व का जो पहलू मुझे समसामयिक लेखकों की कतार से उनको अलग रख कर देखने के लिए बाध्य करता है, उसके दो-चार अनुभव-प्रसंग संक्षेप में आपके सामने रखना चाहता हूं। उनसे मेरी पहली मुलाकात धनबाद में हुई थी। शायद 1988 का साल था। जन संस्कृति मंच की ओर से प्रेमचंद पर संगोष्ठी रखी गयी थी। पहली बार उनको बोलते सुना। सीधे-सादे ढंग से उनकी बात शुरू हुई, फिर उनके ब्योरे धीरे-धीरे गहराई और विस्तार पाने लगे। अंत होते-होते मैं उनके विवेचन-विश्लेषण का मुरीद हो चुका था। उस दिन अपने गुरु प्रोफेेसर नागेश्वर लाल की लच्छेदार शब्दावली की चमक धुंधली पड़ गई थी और अपना वहम भी सुस्त हो़ गया था कि मैं धारदार बोलता हूं। यह भी साफ हुआ कि नतीजों का वजन अभिव्यक्ति की तराश पर भारी पड़ जाता है। एक ऐसा ही अवसर था जब रांची विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग में डॉ. ऋता शुक्ल के आमंत्रण पर एक विशेष सत्र में हमदोनों बतौर वक्ता साझेदार हुए। विषय था भारतीय अस्मिता और भारतीय मूल के अंग्रेजी उपन्यासकार। मैंने अपनी बात पहले रखी, लेकिन संदर्भगत विस्तार और विषयांतर के कारण ज्यादा समय लग गया। फिर खगेंद्र ठाकुर जी आए और अपनी धीर-गंभीर शैली में उस विषय-प्रसंग का यथोचित समापन किया।

उनके साथ मंच साझा करने का एक अवसर दूरदर्शन की ओर से मिला था। सामयिक कविता की विसंगतियों पर परिचर्चा थी और ठाकुर जी के साथ मुझे भी अपना वक्तव्य देना था। फिर ऐसे अवसर अनेक आए, बल्कि बारबार आते रहे। कभी रांची में, कभी हजारीबाग में, कभी धनबाद में। कभी निजी बैठकों में। कभी पुस्तकों के लोकार्पण समारोहों में। हर जगह एक विनम्र, शालीन और सहज व्यक्ति के दर्शन हुए। हिंदी संसार में, स्थानीय स्तर से केंद्रीय स्तर तक, जितना मान-सम्मान उनको मिलता रहा, उस पृष्ठभूमि में देखें तो उनके व्यवहार में हिंदी पट्टी के आम आदमी की परछाईं हमेशा मिलती रही। वर्ष 1913 में रांची में पहला शैलप्रिया स्मृति सम्मान निर्मला पुतुल को मिला था। उस कार्यकर्म में मुख्य अतिथि के बतौर मंगलेश डबराल आए थे और मैंने समारोह की अध्यक्षता के लिए खगेंद्र ठाकुर जी को कहा था। वे उस समय पटना में थे। वे आये और कार्यक्रम में शामिल भी हुए। लेकिन उन्होंने हमलागों से कोई अतिरिक्त सुविधा लेने से दो टूक इनकार कर दिया था।

और अंत में एक अनुभव निजी संदर्भ में। उन्होंने मेरे अनुरोध पर मेरी कविता पुस्तक ‘पठार को सुनो’ का लंबा ब्लर्ब लिखा था। उन्होंने पहले जो कुछ लिख कर दिया था, उसके एप्रोच से मैं सहमत नही था। मैंने झिझकते हुए उनके सामने अपना मनोभाव रखा था कि मुझे रूटीन किस्म की महज रस्मी कोई सामग्री नहीं चाहिए थी। आप चाहें तो उस ड्राफ्ट में परिष्कार करते हुए कुछ नया लिख दें। ठाकुर जी सहज भाव से तैयार हो गए। मैंने उनकी टिप्पणी टाइप कर उन्हें दे दी। और कुछ दिन बाद उन्होंने एक दूसरा नया संशोधित आलेख तैयार कर मेरे हवाले कर दिया। इसी रूपांतरित सामग्री का उपयाग उक्त पुस्तक में किया गया है।

इस आधी-अधूरी व्यक्ति-चर्चा को यहीं स्थगित करते हुए कहना चाहता हूं कि उनके मानक कृतित्व के बड़े फलक पर कभी पूरे मनोयोग से लिखूंगा। उनकी सहजता, सादगी, सुलभता, उदारता, शालीनता, विनम्रता और अडिग वैचारिक निष्ठा के प्रसंगों की यादगार धरोहर अनगिनत लोगों के पास संचित होगी। मैंने उन्हें अधिकतर लॉन्ग शॉट में ही देखा है, कभी- कभी मिडिल शॉट में भी। लेकिन क्लोज अप में नहीं देखा। स्मृतिशेष अग्रज साथी को आखिरी जोहार।

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