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डाउनलोड करेंचंडीगढ़/पानीपत. जाट आरक्षण की मांग को लेकर 2016 में हुए आंदोलन के दौरान वापस लिए जा रहे केसों की पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने डिटेल्स तलब की है। जस्टिस अजय कुमार मित्तल व जस्टिस अनुपिंदर सिंह ग्वाल की बैंच ने हरियाणा सरकार के होम सेक्रेटरी से पूछा कि एफिडेविट दायर कर बताए कि कितने केस वापस लिए जा रहे हैं और इन मामलों में एफआईआर किस अपराध में दर्ज की गई थी। बैंच ने कहा कि वे जानना चाहता है कि वापस लिए जा रहे मामलों में गंभीर अपराध भी शामिल है या नहीं।
22 मई के लिए सुनवाई तय की गई
हाईकोर्ट ने उक्त निर्देश एमिक्स क्यूरी (अदालत के सहयोगी) सीनियर एडवोकेट अनुपम गुप्ता द्वारा सुनवाई के दौरान कोर्ट में मीडिया क्लिीपिंग पेश करने पर दिए, जिसमें कहा गया कि हरियाणा सरकार जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान दर्ज एफआईआर वापस ले रही है।। हाईकोर्ट ने मामले पर 22 मई के लिए सुनवाई तय की है।
हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए स्वयं संज्ञान लिया था
अनुपम गुप्ता ने कोर्ट में कहा कि प्रकाश सिंह कमेटी ने इस मामले में डिस्ट्रिक्ट वाइज रिपोर्ट दी थी जिसमें हत्या, गोली चलाए जाने और बड़े स्तर पर हिंसा के मामलों की डिटेल्स दी गई थी। आंदोलन के दौरान हुई हिंसा का नतीजा था कि हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए स्वयं संज्ञान लिया था। ऐसे में गंभीर अपराध के मामलों में केस वापस लिए जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। ऐसे में होम सेक्रेटरी से पूछा जाना चाहिए कि किस तरह के केस वापस लिए जा रहे हैं।
एसआईटी हेड से स्टेटस रिपोर्ट तलब
हाईकोर्ट ने इन मामलों की जांच कर रहे स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम (एसआईटी) हेड आईपीएस अफसर अमिताभ ढिल्लों से भी स्टटे स रिपोर्ट मांगी हैकि हिंसा से जुड़े कितने मामलों में एफआईआर दर्ज की गई थी। कोर्ट में कहा गया कि अक्टूबर माह के बाद से एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट नहीं दी है। हाईकोर्ट ने एसआईटी का गठन उस समय किया था जब कोर्ट को पता चला कि रोहतक में दर्ज 1205 मामलों में से 921 मामलों में रिपोर्ट तैयार की गई हैं। 184 मामलों में रिपोर्ट तैयार ही नहीं की गई। 81 केसों में कुल 173 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
हाईकोर्ट ने लिया था संज्ञान
जाट आरक्षण की मांग को लेकर वर 2006 में हुए आंदोलन के दौरान हिंसा की घटनाओं और मुरथल में गैंगरेप के मामले पर हाईकोर्ट के दो जजों ने मीडिया रिपोर्ट पर संज्ञान लिया था। कहा था कि इस तरह के मामले में न्यायिक दखल से नहीं बचा जा सकता। यह संविधान की हत्या करने जसा मामला है, जहां कानून की खुलेआम अनदेखी की जाए।
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