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श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
अरविंद केजरीवाल की \'आप\' की दिल्ली में जीत ऐसे समय में हुई है जब भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की राजनीति एक रोचक मोड़ पर है.
माना जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के बीच राज्य में सरकार बनाने को लेकर बातचीत निर्णायक दौर में हैं.
भाजपा बार-बार कह रही है कि दिल्ली चुनाव का जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने से कोई संबंध नहीं है. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा जानबूझकर दिल्ली चुनावों के मद्देनज़र जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने को टाल रही थी.
विश्लेषकों का मानना था कि इसका कारण ये था कि पीडीपी जैसी पार्टी के साथ भाजपा का सरकार बनाना, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को दिल्ली चुनावों के दौरान एक बड़ा हथियार उपलब्ध करा देता. पीडीपी पर \'नरम अलगाववाद\' को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं.
दिल्ली के चुनाव के नतीज़े आ गए हैं और आम आदमी पार्टी ने उसमें भाजपा और कांग्रेस दोनों को धराशायी कर दिया है. शायद अब जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने की प्रक्रिया में आने वाले दिनों तेजी आएगी.
हार पर मलहमदिल्ली में चुनाव हार के बाद भाजपा जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाकर दिल्ली में मिले घावों पर मलहम लगाना चाहेगी. लेकिन दिल्ली में मिली हार के बाद यहाँ भी भाजपा के लिए वैसा माहौल नहीं रहेगा जो इसके पहले था.
कथित मोदी लहर पर सवार भाजपा से सत्ता में साझीदारी को लेकर मोलतोल करना पीडीपी के लिए जटिल साबित हो रहा था. दिल्ली के नतीज़ों के बाद पीडीपी नेता मुफ़्ती मोहम्मद सईद ज़्यादा आत्मविश्वास के साथ भाजपा से बातचीत कर सकेंगे. जबकि भाजपा का रुख पहले से नरम पड़ सकता है.
दोनों दलों ने पहले ही सात फ़रवरी को हुए चार राज्य सभा सीटों के चुनाव में तालमेल किया था. हालांकि दोनों मिलकर भी कांग्रेस के एकमात्र उम्मीदवार ग़ुलाम नबी आज़ाद को हरा नहीं सके. आज़ाद सीपीआई(एम) और दो निर्दलीय विधायकों की मदद से अपनी सीट निकालने में कामयाब रहे.
भाजपा, पीडीपी की मदद से एक सीट जीतने में कामयाब रही. वहीं पीडीपी को दो सीटें मिलीं. राज्य सभा चुनावों में दोनों दलों के आपसी तालमेल से यह संकेत मिला कि दोनों दल सरकार में साझेदारी की दिशा बढ़ रहे हैं.
दोबारा चुनाव कराने की रायदिल्ली चुनावों के नतीज़ों के बाद कश्मीर घाटी में एक अन्य राजनीतिक और सामाजिक चर्चा शुरू हो गई है.
सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ कश्मीरी अरविंद केजरीवाल की जीत का हवाला देते हुए पीडीपी से भाजपा से तालमेल न करके फिर से चुनाव कराने की माँग करने की राय दे रहे हैं.
सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ कश्मीरियों को लग रहा है कि अगर फिर से चुनाव हुए मुफ़्ती मोहम्मद सईद वही कर सकते हैं जो केजरीवाल ने दिल्ली में किया है.
लेकिन ऐसी राय को घाटी के लोग शायद ही ज़्यादा गंभीरता से लें क्योंकि यहाँ की राजनीतिक पार्टियों को भी पता है कि जम्मू-कश्मीर, कोई दिल्ली नहीं है.
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