--Advertisement--

जीने की राह कॉलम: स्थायी खुशी चाहिए तो मन की उछल-कूद की वृत्ति काबू करें

खुशी और गम का केंद्र मन है और मन के लिए कहा गया है कि यह मृग मरीचिका प्रवृत्ति का होता है

Dainik Bhaskar

Aug 13, 2018, 12:25 AM IST
Jeene Ki Raah Column By Pandit Vijay Shankar Mehata

खुशी का मिलना इस बात पर निर्भर होता है कि आप उसे ढूंढ़ कहां रहे हैं। यदि बाहर की दुनिया में खुशी तलाश रहे हैं और आपको लगता है कि बाहर के साधन- टीवी, मोबाइल, क्लब, यार-दोस्तों की संगत-पार्टी इन पर टिककर खुशी मिल जाएगी तो थोड़ा सावधान हो जाएं। वहां खुशी मिलेगी तो सही लेकिन, ध्यान रखने वाली बात यह है कि ये सारे साधन जब तक हैं तब तक ही वह खुशी है। ये हटे तब क्या होगा? इस सवाल का उत्तर इसलिए ढूंढ़िए कि खुशी और गम का केंद्र मन है और मन के लिए कहा गया है कि यह मृग मरीचिका प्रवृत्ति का होता है। हिरण कस्तूरी की सुगंध के लिए इधर-उधर छलांग लगाता है और वह महक उसी के भीतर होती है। मन भी बिल्कुल इसी तरह है।

यहां-वहां, इसकी-उसकी तलाश में छलांगें मारता फिरता है। उसे जो चाहिए वह दुनिया के साधनों में ढूंढ़ता है, जबकि होता भीतर ही है। इसलिए जिन्हें स्थायी खुशी की तलाश हो उनको मन की उछल-कूद की वृत्ति पर नियंत्रण करना आना चाहिए। जैसे ही मन नियंत्रित हुआ, रुका कि फिर आप वे जितने साधन, जहां से खुशियां मिल सकती हैं या मिल रही हैं, उनको दूर से देखेंगे और इस्तेमाल भी करेंगे। तब इनके इस्तेमाल के बाद आप स्थायी रूप से खुश रह सकेंगे। खुशी की लंबाई बढ़ाई जा सकती है, उसी का नाम स्थायी होना है। बाकी मानकर चलिए, यदि ठीक से मन पर काम किया तो खुशी के बाद जो गम आने वाला है, आप उसे भी बहुत जल्दी खुशी में बदल लेने के लायक हो जाएंगे।

(जीने की राह कॉलम पं. विजयशंकर मेहता जी की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें JKR और भेजें 9200001164 पर)

X
Jeene Ki Raah Column By Pandit Vijay Shankar Mehata
Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..