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जीने की राह कॉलम: बोलने में चतुरता और सुनने में उदारता हो

मुस्कान का आना-जाना बना ही रहता; जब आपके होठों पर मुस्कान हो और यदि आप उसका स्वाद लेने लगें तो वह हंसने में बदल जाती

Dainik Bhaskar

Sep 11, 2018, 12:07 AM IST
पं. विजयशंकर मेहता। पं. विजयशंकर मेहता।

कभी विचार करिएगा कि किन परिस्थितियों में आपके चेहरे पर मुस्कान आती है और कौन से हालात होते हैं, जब ये मुस्कान चली जाती है। क्योंकि मुस्कान का आना-जाना बना ही रहता है। जब आपके होठों पर मुस्कान हो और यदि आप उसका स्वाद लेने लगें तो वह हंसने में बदल जाती है। जब हंसने का रस बढ़ जाए तो वही मुस्कान ठहाका बन जाती है।

स्कान, हंसी और ठहाका.. जब इनका समापन हो और उसके बाद भी असर बना रहे तो उसे कहते हैं आनंद। इस क्रम को जीवन में उतारने के लिए अभ्यास करना पड़ता है, जो लंका कांड में सिखा रहे थे रामजी। अंगद ने लौटकर लंका के समाचार श्रीराम को सुनाने शुरू कर दिए थे। उस दृश्य पर तुलसीदासजी ने दोहा लिखा- परम चतुरता श्रवन सुनि बिहॅसे राम उदार।

समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार।। अंगद की परम चतुरतापूर्ण उक्ति सुनकर उदार रामजी हंसने लगे। फिर बालिपुत्र ने लंका और रावण के समाचार कहे। यहां दो बातें हैं- अंगद पूरी चतुरता के साथ अपनी बात कह रहे थे और उसी चतुरता के कारण श्रीराम हंसे। तो अंगद से सीखिए कि जब भी कोई बात की जाए, उसकी प्रस्तुति ऐसी हो कि सामने वाले के आनंद में वृद्धि कर दे। और श्रीराम सिखा रहे हैं कि हंसने के लिए उदार भाव लाना पड़ता है। यदि उदार नहीं हैं तो आपकी मुस्कान अभिनय है, दिखावा है। जीवन को अच्छे से जीना चाहें तो बोलने में चतुरता, सुनने में उदारता रखिए, परिणाम में आनंद प्राप्त होगा। यह छोटी सी घटना बड़ा संदेश दे रही है।

(जीने की राह कॉलम पं. विजयशंकर मेहता जी की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें JKR और भेजें 9200001164 पर)

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पं. विजयशंकर मेहता।पं. विजयशंकर मेहता।
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