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डाउनलोड करेंइस सरकार का अंदाज यह है कि जिस भी सरकारी कंपनी में घाटा नज़र आए या फिर कोई गड़बड़ी हो, उसे तुरंत बंद करने पर उतारू हो जाना। जैसे यदि किसी व्यक्ति की अंगुली में चोट हो तो उसे मरहम-पट्टी न कर उखड़वा दिया जाना बेहतर समझा जाए।
लगातार एक-एक कर सरकारी कंपनियों की नीलामी बेहद दुखद है। आज एअर इंडिया कल बीएसएनएल फिर विभिन्न विश्वविद्यालय और इस तरह तो पूरा देश निजी हाथों में सौंप दिया जाएगा। कुछ युवा अपना मन यह सोचकर मसोसते हैं कि आरक्षण उनकी नौकरी ले रहा है लेकिन, वे शायद यह नहीं जानते की सरकारों की नीति अब कुछ इस प्रकार की हो चुकी है कि न सरकारी कंपनियां रहेंगी, न सरकार की कोई जिम्मेदारी होगी और न आरक्षण का मुद्दा।
दुःख तो उन युवाओं के लिए महसूस होता है, जो इस गलतफहमी में थे कि मोदी सरकार तेजी से विकास की राह पर चलकर बड़ी संख्या में नौकरियां पैदा करेगी पर बीते चार वर्ष इस लिहाज से कुछ होता हुआ नहीं दिखा। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों के लिए लगता है कि अब किसी सुधार का मतलब जाति-धर्म के मतभेद को पुरजोर तरीके से प्रस्तुत करना है और लोगों को सड़कों पर मनमानी करने के लिए उकसाकर अराजकता को जन्म देना है।
यह बात गौर करने वाली है कि जिस प्रकार जाति-धर्म से ऊपर देश है उसी प्रकार आरक्षण से ऊपर सरकारी या प्राइवेट नौकरियों की मौजूदगी है। यदि नौकरियां ही नहीं होंगी तो आरक्षण से लाभ या हानि क्या? बेहतर होगा यदि नौजवान सरकारों को रोजगार पैदा करने पर मजबूर करें और उनका मूल्यांकन इसी आधार पर करें न कि जाति-धर्म या आरक्षण के समर्थक या विरोधी की भूमिका पर। यहां हम बेरोजगारी के मसले पर मैन्युफैक्चरिंग आदि पुराने समाधानों की दृष्टि से सोच रहे हैं वहीं, तेजी से बढ़ते ऑटोमेशन ने इस तरह के समाधान की व्यर्थता तय कर दी है।
दरअसल, टेक्नोलॉजी की बदलती दुनिया को देखकर हमें वर्क फोर्स तय करने पर ध्यान देना चाहिए। इस दृष्टि स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रम महत्वपूर्ण है पर हमें उनमें भी हमें नए विकसित कौशल के विकास पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
जीने की राह
पं. विजयशंकर मेहता
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