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जीने की राह कॉलम: जरूरत के वक्त ईश्वर से साहस मांगें

3 वर्ष पहले
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याद करने से विरह और प्रताप दोनों बढ़ जाते हैं। हम किसी के विरह में डूबे हों, किसी से दूरी सता रही हो और यदि उसको ज्यादा याद करें तो विरह की पीड़ा और बढ़ने लगती है। इसीलिए समझाया जाता है कि भूल जाओ.,जितना ज्यादा याद करोगे, तकलीफ उतनी ही अधिक होगी। लेकिन याद करने से प्रताप, हिम्मत और ताकत बढ़ भी जाती है। सही है कि विरह की पीड़ा बढ़ानी नहीं चाहिए, तो ऐसी स्थिति में विस्मृति बड़े काम की है। लेकिन यदि हिम्मत बढ़ाना हो तो कुछ बातें याद भी करनी चाहिए। यह प्रयोग कर रहे थे अंगद रावण की सभा में।

 

तुलसीदासजी ने इस पर लिखा, ‘समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा। रामजी के प्रताप का स्मरण करके अंगद क्रोधित हो उठे। उन्होंने रावण की सभा में प्रण करके दृढ़ता के साथ पैर रोप दिया। यहां दो बातें सामने आई हैं- श्रीराम के प्रताप को स्मरण किया और दृढ़ता के साथ पैर ठोंक दिया। परमात्मा का प्रताप उस समय जरूर याद करें जब कोई बड़ा चुनौतीभरा काम कर रहे हों। जिस समय लगे कि आपकी ताकत के अलावा भी एक शक्ति की आवश्यकता है तो वह शक्ति परमात्मा के स्मरण से प्राप्त हो सकती है।

 

परमात्मा को याद करने से मस्तिष्क में कुछ ऐसे परिवर्तन आते हैं, शरीर में कुछ ऐसी रासायनिक क्रियाएं होने लगती हैं जो साहस को बढ़ाती है और फिर आप उन स्थितियों का सामना करने में सक्षम हो जाते हैं जहां अपने आपको थोड़ा कमजोर पा रहे थे। तो भगवान से जो भी मांगें, जरूरत पड़ने पर साहस व हिम्मत भी जरूर मांगें। 

 

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