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डाउनलोड करेंवीर्य को शरीर का राजा कहा गया है और इसके सदुपयोग का नाम ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य ऐसा आचरण है, जो सभी को नसीब नहीं होता। दुनिया में बहुत कम ऐसे ब्रह्मचारी हुए, जिनके चरित्र पर कभी कोई लांछन नहीं लगा। ऐसे ही श्रेष्ठ ब्रह्मचारी थे परशुराम। आज परशुरामजी को इसलिए भी याद किया जाना चाहिए कि उन्होंने ब्रह्मचर्य न सिर्फ सुरक्षित रखा बल्कि उसका समाज के लिए सदुपयोग किया।
अपने ब्रह्मचर्य को तप से जोड़कर लोग वन में चले जाते हैं या आत्मकेंद्रित जीवन जीने लगते हैं। लेकिन, जो परशुरामजी ने किया, वह आज हम सबके लिए सबक है कि अपनी योग्यता का उपयोग हर उस जगह पर जरूर करिए, जहां कुछ गलत हो रहा हो। जैसे पूजाकर्म में समर्पण जरूरी हैै, ऐसे ही सत्ताधर्म में समझ आवश्यक है।
परशुराम राजा नहीं थे, लेकिन सत्ता का क्या धर्म होता है, उन्हें यह समझ उस दौर के अच्छे-अच्छे राजाओं से अधिक थी। चार बड़े काम परशुराम कर गए। जाति भेद मिटाया, गलत सत्ता से संघर्ष करना सिखाया, परिवार की बिल्कुल नई परिभाषा दी तथा आचरण में अनुशासन का क्या महत्व है, यह इसी चरित्र ने समझाया था।
परशुराम को केवल ब्राह्मणों से जोड़ना भूल होगी। वे ब्राह्मण थे, लेकिन समूची मनुष्यता के लिए कुछ ऐसे संदेश दे गए कि ब्राह्मण न सिर्फ जाति, बल्कि एक जीवनशैली बन गई। ब्राह्मण जैसी जीवनशैली आज हर उस व्यक्ति के लिए जरूरी है, जो अपने मनुष्य होने पर गर्व करना चाहता हैै और जो सामाजिक व राष्ट्रीय जीवन में विशेष भूमिका निभाते हुए उसे कुछ अच्छा देना चाहता है।
जीने की राह
पं. विजयशंकर मेहता
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