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महाभारत 2019 भास्कर दृष्टि: स्वार्थ-पुरुषार्थ के प्रश्न; भाजपा कैसे लाएगी 272? विपक्षी किसे मानेंगे सारथी?

मोदी के लाख प्रयत्नों के पश्चात् भी, निरन्तर एक वर्ष से उनका दल हताशा का सामना कर रहा है।

कल्पेश याग्निक | Last Modified - Jun 03, 2018, 06:51 AM IST

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    लेखक दैनिक भास्कर के समूह संपादक हैं।

    शत्रु की शक्ति बांट देने से उसे पराजित करना सरल हो जाता है। महाभारत में उल्लेखित इस भावार्थ के वाक्य को बीते सप्ताह आए लोकसभा उपचुनाव परिणामों में स्पष्ट देखा गया।


    उत्तरप्रदेश की चर्चित कैराना सीट पर उनके शत्रु दलों की शक्ति बंटी नहीं। इसलिए विजय उनके शत्रु दलों को मिली। महाराष्ट्र में पालघर क्षेत्र में पताका भाजपा की फहराई। चूंकि वहां विरोधी शक्तियां बंटी हुई थीं।
    इस तरह यह सप्ताह सभी दलों के लिए गहन चिंतन का रहा।
    सर्वश्रेष्ठ सेनापति कौन है? वही जो अपने सैनिकों का मनोबल सदैव ऊंचा रखे। चूंकि हजार हाथियों का बल भी साथ हो तो भी, गिरे मनोबल वाली सेना को निर्बलता से नहीं उबार सकता। आज यह संकट सभी का है।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लाख प्रयत्नों के पश्चात् भी, निरन्तर एक वर्ष से उनका दल हताशा का सामना कर रहा है। कर्नाटक जीत चुकने के उपरान्त भी हार गया। और उपचुनावों में तो पराजय होती ही जा रही है।
    उधर, विपक्ष की चिंता कम हो रही है। क्योंकि उभर रहा है कि अपराजेय लगने वाला मोदी अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा, छोटे-छोटे दलों के एकसाथ आने से रोका जा सकता है। बड़े-बड़े विपक्षी दल, जो मोदी के समक्ष छोटे हो चुके थे, अब सिर उठा रहे हैं।
    किन्तु चिंतन से मुक्त नहीं हैं विरोधी खेमे। जैसे मल्लाह के बिना नाव और सारथी के बिना रथ इधर-उधर भटकने लगते हैं - वैसे ही एक सर्वमान्य नेतृत्व के अभाव में विपक्षी एकता डावांडोल हो सकती है।
    महाभारत स्वार्थ की कथा है। अब, जबकि ‘मोदी विरुद्ध अन्य सभी’ का दृश्य उभर ही चुका है- तो रणनीति क्या होगी? महाभारत पुरुषार्थ की कथा है। इसलिए उत्सुकता है कि मोदी क्या चमत्कार दिखाएंगे? और राहुल गांधी क्या करेंगे? वे दैत्याकार उत्साह से भरे हुए हैं किन्तु कांग्रेस संख्या में बहुत पीछे है।
    काल्पनिक ही सही, किन्तु सर्वाधिक 80 सांसदों वाले उत्तरप्रदेश में यदि महागठबंधन बना रहे - तो भाजपा 70 से सीधे 29 पर आ सकती है। आधार है मतों की संख्या, प्रतिशत व सभी का जोड़।
    तो विपक्ष सर्वाधिक ऊर्जा, समय व धन निश्चित रूप से उप्र व उन राज्यों में झोंकेगा, जहां 2014 में भाजपा को सारी सीटें मिली थीं। मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात। अनुमान है कि अब ऐसा पुन: नहीं हो सकेगा। तो प्रश्न होगा- नरेन्द्र मोदी-अमित शाह का ध्यान कहां होगा?
    क्योंकि सभी सांसद जीतने वाले क्षेत्र यदि घटने लगे तो अन्य स्थानों पर तो भाजपा पहले ही नगण्य हैं। दक्षिण में 130 संसदीय क्षेत्र हैं। दक्षिण में भाजपा के पास कुल 21 सांसद हैं, 17 अकेले कर्नाटक से। वो तेलुगुदेशम पार्टी को पुन: मनाना चाहेगी। जगन रेड्‌डी को पास लाना चाहेगी। रजनीकांत को अपनी ओर खींचना चाहेगी। किन्तु क्षीण संभावना।
    तो भाजपा कहां से लाएगी 272 का आंकड़ा?
    उसे ओडिशा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर में साधन, धन, शक्ति और कार्यकर्ता युद्ध-स्तर पर उतारने होंगे। यहां 136 सीटें हैं।
    किन्तु यहां उसके अपने कोई नहीं हैं। यहां क्षेत्रीय दल भी स्वयंभू हैं।
    व्यूह, रचना सरल है। तोड़ना कठिन।
    किन्तु सत्ता संसार का सर्वोच्च नशा है। कोई जय पराजय इसे कम नहीं कर सकती।
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