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डाउनलोड करेंकहां डर कर छुपी थी मानवता जब कठुआ में बच्ची को कुचला जा रहा था?
कहां सो रहा था कानून जब उन्नाव में नवयुवती की गरिमा पर हमला हो रहा था?
कहां है न्याय?
न्याय तो अन्याय के पैरों तले दबा पड़ा है।
पापियों ने अपनी दासता की जंजीरों में जकड़ लिया है न्याय को।
एेसा कैसे और क्यों हो रहा है? सभी की समझ से परे है।
किन्तु कुछ बातें तो स्पष्ट हैं।
कठुआ में बच्ची नन्हें घोड़ों को चरते देख प्रसन्न हो रही थी। भूखे भेड़ियों की तरह झपटे अमानुषों ने उठा ली। अपहरण कर लिया।
यहीं से आरम्भ हुआ कानून की धज्जियांे का उड़ना। कानून का राज सर्वोच्च होता है। कानून का राज चलाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है।
सरकार का वास्तविक चेहरा पुलिस है। पुलिस यानी कानून के रखवाले।
खुफिया पुलिस को कभी कुछ भी पता नहीं चलता? ऐसा क्यों?
एक 8 वर्ष की बच्ची उड़ा दी जाए। ग़ायब कर दी जाए। कठुआ के छोटे से गांव में। जहां मुट्ठी भर लोग, मुट्ठी भर लोगों के बीच रहते हों। जहां किसी की किसी से मित्रता-शत्रुता सहज ही पता चलती हो। जहां प्रत्येक परिवार को एक-दूसरे की घटनाएं पता चल ही जाती हों। वहां पुलिस को कुछ भी पता नहीं चलता?
झूठ है। सब पता चलता है।
उधर, उन्नाव में देखें।
नवयुवती, विधायक के पास जाती है। फिर ग़ायब हो जाती है।
एक युवती ग़ायब हो जाए, किसी को कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता?
झूठ है। सबको पता है। फ़र्क सिर्फ माता-पिता को पड़ता है।
फिर, पुलिस के पास जाते हैं। कठुआ, उन्नाव हर तरफ़ पुलिस लपलपाती है। लालच। भ्रष्टाचार। निकृष्ट वातावरण। पैसों के लिए कुछ भी करने को तैयार। बिकना तो बहुत मामूली बात।
खूब बिके पुलिस वाले।
कठुआ में तो दोनों तरह के पुलिस वाले थे। वो जो आतंक से निपटने के लिए, आतंकियों में से ही कुछ टूट चुके उनके हितैषी ‘स्पेशल पुलिस ऑफिसर’ बनाए जाते हैं जम्मू-कश्मीर में। वैसे दो। और थानों-चौकियों में ग़ैर-कानूनी कारनामों को कानूनी रंग देने की महारत प्राप्त पुलिस वाले तो थे ही।
इतने गिर गए। कि एक रिटायर्ड रेवेन्यू विभाग का कर्मचारी अपने भतीजे को बच्ची की हत्या के लिए तैयार करता है - सुनकर-जानकर भी उन पुलिसवालों का हृदय न पिघला।
वह भतीजा ड्रग लेता है। नशे बेचता है। स्कूल में बच्चियों के साथ गंदे से गंदा व्यवहार करता है। स्कूल से निकाल दिया जाता है। अपराध की ओर बढ़ जाता है। पुलिस बखूबी जानती थी।
किन्तु पैसे खाने को लालायित थी। और अपहरण, दुष्कर्म, नशे के डोज़ देने, हत्या करने जैसे सारे जघन्य अपराध बनाए जाते हैं - तो एक हेड कॉन्स्टेबल और एक सब इन्सपैक्टर अपनी कीमत बढ़ाते चले जाते हैं!
वर्दी पहले डेढ़ लाख में बिकी। फिर 3 लाख ऐसे उड़ाए जैसे कीचड़ में गिरने से दुर्गंध भरे छींटे। किन्तु पांच लाख और मांगे। क्यों? क्योंकि दरिंदगी, हिंस्त्र जानवरों को भी मात कर गई।
अपहृत बच्ची को नशीली दवाइयां दे-देकर त्रास देते रहे। और शोषण करते रहे। यदि चार्ज शीट की एक पंक्ति पढ़ें - तो मस्तिष्क जड़ हो जाता है। आंखें पथरा जाती हैं। खून खौलने लगता है। जब सभी ने दुष्कर्म कर लिया - तब बच्ची को पत्थरों से कुचल-कुचल कर, टकरा-टकरा कर मार डाला। किन्तु इससे ठीक पहले, एक ने रोका। कहा - वो एक बार और उसे नष्ट करना चाहता है!!
हैवान भी शर्मिन्दा होगा यह जानकर।
किन्तु हमारी पुलिस नहीं डिगी। उसने ‘सौदे’ जारी रखे। इतने सुबूत थे। सब मिटा दिए।
पाप, किन्तु अमिट होता है।
जिस रिटायर्ड कर्मचारी ने यह वीभत्स षड्यंत्र गढ़ा था -उसके देवस्थानम् में जहां बच्ची बंधक बनाकर रखी गई थी- उसके वहां मिले बाल से बच्ची के डीएनए का मिलान हो गया।
पुलिस वाले इतने गिरे हुए?
क्यों? क्योंकि पुलिस से सब डरते हैं। पुलिस केवल सरकार से डरती है। सरकार से भी केवल इसलिए कि बेल्ट न उतर जाए। वर्दी न छिन जाए। छोटा डर, स्थानांतरण का भी होता है। निलंबित होने से कतई नहीं डरते। क्योंकि ये कोई दण्ड नहीं है। पैसा देकर, जब चाहे वापस आ सकते हैं।
जैसा कि उत्तरप्रदेश में होगा। जितने भी पुलिस वाले निलंबित किए गए हैं - सब लौट आएंगे।
तो वहीं, सरकार में ही साथ मिलने लगा। कठुआ के कलंक को अपने मस्तक का तिलक बताने का कुप्रयास करते हुए सत्ता में भागीदार भाजपा के विधायक-मंत्री खुलकर आ गए!
तो पुलिस क्यों न अपराध करेगी?
फिर, वकील भी आ गए।
फिर, नेताओं ने इसे हिन्दू-मुस्लिम रंग दे दिया। भाजपा के केन्द्रीय नेता, सांसद आए। हिन्दू बच्चियों पर दुष्कर्म होने पर चुप रहने का देश पर आरोप लगा दिया। मुस्लिम बच्ची पर वैसा होने पर भड़काने का आरोप मीडिया पर मढ़ दिया।
क्यों नारी गरिमा भंग करने वाले हमलावर हत्यारे इससे उत्साहित नहीं होंगे?
क्या अपराध, कानून और न्याय हिन्दू-मुसलमान होते हैं? क्या गरिमा, प्रतिष्ठा और आबरू हिन्दू, मुस्लिम होते हैं?
भ्रष्ट और आपराधिक विचार हैं ये। हिंसक तुलना है। शर्मनाक चर्चा है।
किन्तु सत्ता को यही लुभाता है।
उन्नाव में देखिए।
कठुआ में कानून को आंखें खोलने में तीन महीने लगे।
उन्नाव में तो एक साल लग गया। दो-दो बार प्राथमिक मुकदमा दर्ज हुआ।
किसकी हिम्मत? पुलिस बिकी हुई। सरकार दबी हुई।
जी, हां। वहां की सरकार को दमखम वाला मानने वालों की आंखें खुलनी चाहिए। जानकर कि दस-बारह ठाकुर विधायकों के विरोध से ही सरकार घबरा गई। अभी विधान परिषद् चुनाव आ गए हैं। सबका साथ चाहिए। सब विधायकों का।
वहां पुलिस का भ्रष्ट आचरण ऐसा रहा कि युवती की शिकायत पर कार्रवाई तो दूर, उल्टे उसी के पिता को गिरफ्त में ले लिया। बुरी-बुरी तरह पीटा। विधायक के भाई ने मार-मार कर अंतत: उन्हें मार ही डाला। ऐसा कोई अनुमान नहीं है। जांच रिपोर्ट में लिखा है।
और, कानून के रखवाले जब ऐसा करने दे रहे हों, देख रहे हों - तब कानून को अदालत में न्याय के लिए स्थापित करने की जिम्मेदारी किसकी है? वकील की।
तो उन्हें भी देखिए।
कठुआ में वकील खड़े हो गए। न्यायालय में नहीं। सड़कों पर।
टायर जलाते फोटो खिंचवाए। कि चार्जशीट दायर न हो सके! दुर्भाग्य।
अति यह कि हाथ में हमारा तिरंगा ले, लहराया!
तिरंगे का ऐसा तिरस्कार करने की हिम्मत कैसे हुई?
चूंकि तिरंगे की रक्षा करने वाले तो सरे-बाज़ार बिक रहे हैं।
और, तिरंगे की रक्षा तो तभी सार्थक है जबकि जिस भारत भूमि के लिए वो लहराता है - वहां की बच्चियां, युवतियां, महिलाएं सुरक्षित रहें।
अन्यथा वो एक कपड़ा मात्र है।
भुजाएं फड़फड़ाती हैं, तो तिरंगा है।
यौन अपराधियों को फोड़ा जाता है, तो तिरंगा है।
घूसखोर पुलिस को सींखचों में डाला जाता है, तो तिरंगा है।
सत्तालोलुप अपराधी विधायकों व कर्तव्य विमुख सरकारों को नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनाया जाता है, तो तिरंगा है।
उन्नाव कांड में तो यह स्थिति है कि गृह सचिव व प्रदेश पुलिस प्रमुख ‘माननीय विधायक महोदय’ कह-कह कर भयाक्रांत दिखे।
और वकील? एड्वोकेट जनरल की बात सुनिए। जब हाईकोर्ट के जस्टिस दिलीप बाबासाहेब भोंसले और जस्टिस सुनील कुमार ने पूछा - क्या विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की गिरफ्तारी होगी? एड्वोकेट जनरल ने कहा - कुछ पता नहीं। कह नहीं सकते। कानून के अनुसार काम होगा। बचाव पक्ष व शिकायत पक्ष दोनों के बयान के बाद ही कुछ कह सकते हैं!
एक साल बाद! अभी बयान ही नहीं? स्पेशल टीम बन गई। रिपोर्ट आ गई। गिरफ्तारियां हो गईं। किन्तु अभी और जांच चाहिए?
जांच का जीवाश्म कभी समाप्त नहीं होगा। किन्तु कोई तो सीमा होती होगी?
अब जबकि पुलिस, वकील, सरकार सभी विफल हो चुके हैं - तब हाईकोर्ट ने आदेश िदया - गिरफ्तार करो। बाकी सबकी भी जमानत रद्द।
त्रासदी यह है कि कल तक एड्वोकेट जनरल कह रहे थे कि गिरफ्तार कैसे करें? कानून नहीं है। पुलिस कह रही थी - कोई प्रमाण नहीं है। तो आज कैसे हाईकोर्ट ने कह दिया?
न्याय, जब करना होता है तो कानून चुपचाप न्याय की भाषा बोलने लगता है।
कठुआ कांड भी अब सुप्रीम कोर्ट सुनेगा, तो संभवत: न्याय होगा।
न्याय, मानवता का सर्वोच्च संचालक है।
किन्तु न्याय, संसार में सर्वाधिक दुर्लभ है। विशेषकर महिलाओं के लिए।
न्याय हमेशा मिले, असंभव है। किन्तु पाना ही होगा।
अन्याय तभी तक हावी है जब तक हम विवशता के वस्त्र धारण कर बैठे रहेंगे। आशा है, मुफ्तियों और योगियों तक यह बात जाएगी।
(लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)
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