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महाभारत 2019, भास्कर दृष्टि: हिंसा, मौत, त्रासदी के बीच कैसे उड़ाते होंगे नेता एक-दूजे की हंसी?

धृतराष्ट्र ही नहीं, यहां तो धर्मराज भी आंखें मींचे बैठे हैं। सत्ता का चीरहरण चल रहा है।

Danik Bhaskar | Jun 17, 2018, 08:10 AM IST
कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के समूह संपादक हैं। कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के समूह संपादक हैं।

देशवासियों के लिए यह सप्ताह त्रासद रहा। यदि वास्तव में राजनीति लोगों के प्रति उत्तरदायी होती, तो ऐसे मखौल में नहीं उलझती जो बीते सप्ताह दिखे।

नॉर्थ-ईस्ट जल रहा है। किन्तु राहुल गांधी का समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फिटनेस वीडियो की खिल्ली उड़ाने में जा रहा है। कश्मीर, पुन: मौत की घाटी बनता जा रहा है। किन्तु प्रधानमंत्री की शक्ति यह गिनाने में जा रही है कि हिंसा का उत्तर विकास है। जहां कांग्रेस-राज में सड़कें नहीं बनीं - वहां हमने हवाई अड्‌डे बना दिए! वे ऐसा तब कह रहे हैं जबकि देश में विकास की सबसे बड़ी दस योजनाएं मात्र 2 से 3 प्रतिशत ही पूरी हुई हैं। और महंगाई पिछले वर्ष से दोगुनी हो गई है।

देशभर में किसान दुर्दशा, दुर्बलता और दुख से टूट रहे हैं। किन्तु राष्ट्रीय चिंतन का निरर्थक विषय बना - प्रणब मुखर्जी को, संघ समारोह में जाने के कारण राहुल इफ़्तार पार्टी में बुलाएंगे या नहीं? या भाजपा की ओर से आयोजित एकमात्र इफ़्तार पार्टी में ट्रिपल तलाक़ की शिकार महिलाएं ही क्यों आमंत्रित थीं?

भीमा-कोरेगांव का धक्का लगा। दलितों पर पुन: छिड़ी बहस में मुख्य चिंता रोजगार और उत्थान की नहीं हुई। बल्कि चिंता हुई कि उस नेता को क्यों पकड़ा - जिसका नाम प्रधानमंत्री की हत्या के लिए माओ-आतंकियों द्वारा रचित षड्यंत्र में था?
हमारी राजनीतिक बहस का स्तर कितना गिर गया है। प्रधानमंत्री को समाप्त करने की साजिश को विपक्ष ने खिल्ली उड़ाने का सर्वोत्तम अवसर माना। स्वयं सरकार में सहयोगी शिवसेना ने इसे ‘हाॅरर’ फिल्म करार दिया।
तानों के अवसर स्वयं नेताओं ने भी बुने। कोक को शिकंजी बनाने वाले ने व मैकडॉनल्ड को ढाबा वाले ने बनाया! पिछड़े वर्गों को रोजगार दिलाने का एेसा रोचक किन्तु झूठा उदाहरण क्या प्रभाव डालेगा, कोई नहीं कह सकता।
तमिलनाडु में हिंसा हो, ग़रीब-मज़दूर मर रहे हों - किन्तु वहां सरकार केवल इसी काम में लगी है कि राजीव गांधी के हत्यारों को अब रिहा कर दिया जाए। ‘क्योंकि वे सातों बेचारे दुखी, बीमार, मानसिक प्रताड़ना से ग्रस्त हैं!’
क्या राष्ट्र ऐसी राजनीति, ऐसे नेताओं को स्वीकार करेगा?
धृतराष्ट्र ही नहीं, यहां तो धर्मराज भी आंखें मींचे बैठे हैं। सत्ता का चीरहरण चल रहा है।