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महाभारत 2019 भास्कर दृष्टि: जीएसटी का एक वर्ष, वर्तमान को भूत से ढंकने, भविष्य गढ़ने के प्रयास

प्रत्येक इतिहास को अपनी कुशलताओं से जोड़कर देखना विपत्तिजनक भी हो सकता है। हमारी राजनीति एेसा करती ही जा रही है।

Danik Bhaskar | Jul 01, 2018, 07:41 AM IST
कल्पेश याग्निक दैनिक के समूह स कल्पेश याग्निक दैनिक के समूह स
आज गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स को एक वर्ष हो गया। अत्यन्त साधारण बात है। किन्तु इसे ‘ऐतिहासिक’ बताया जा सकता है। इतिहास को विद्वान अपनी सुविधानुसार पढ़ते हैं। योग्यतानुसार प्रस्तुत करते हैं। दक्षतानुसार अपने प्रयासों से जोड़ देते हैं।
राष्ट्र को स्मरण ही है कि ठीक एक वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद के सेंट्रल हाॅल में ‘मध्यरात्रि’ को जीएसटी लागू करने की घोषणा पर समारोहपूर्वक सत्र बुलाया था। मध्यरात्रि को ऐसा केवल आज़ादी (1947), आज़ादी के 25 वर्ष (1972) और आज़ादी के 50 वर्ष (1997) मनाने के लिए किया गया था। चूंकि देश में स्वतंत्रता जैसे महान संघर्ष से जीएसटी क्या, कोई भी पहल समकक्ष नहीं हो सकती - इसलिए मोदी ने उसे छोटी-छोटी रियासतों के देश में विलय से जोड़ दिया। कि छोटे-छोटे टैक्स का एक राष्ट्रीय टैक्स में विलय का दिन! सूझबूझपूर्ण रहा। जैसे नोटबंदी के वर्षभर में 99% कैश वापस बैंकों में लौट गया। और बंद होने से पहले से भी अधिक नकदी चलन में आ गई। यानी विफल। एेसा जीएसटी में नहीं हुआ। भास्कर के शोध के अनुसार, यह स्वतंत्रता पश्चात् किसी भी सरकार की सर्वाधिक कमाई वाली पहल रही।
किन्तु प्रत्येक इतिहास को अपनी कुशलताओं से जोड़कर देखना विपत्तिजनक भी हो सकता है। हमारी राजनीति एेसा करती ही जा रही है।
अभी संत कबीर के इतिहास पर राजनीति चल रही है। भाजपा का उत्तरप्रदेश में पड़ने वाला प्रत्येक चरण 2019 की तैयारियों से जोड़ दिया जाता है। ठीक भी है। उत्तरप्रदेश में विजय रहे - तो ही देश में विजय रह पाएंगे। किन्तु मगहर में मोदी ने कबीर और गुरुनानक व गोरखनाथ के साथ बैठकर चर्चा करने की बात कही। जो विवादित हो गई। कि वे समकालीन थे ही नहीं। पता नहीं। किसी के पास प्रामाणिकता नहीं है।
आपातकाल को ही लीजिए। 43 वर्ष हुए इसी 25 जून को। कांग्रेस पर हमला करने का ऐसा अवसर बनाया गया कि विस्मय हुआ। इतिहास का दुरुपयोग सर्वाधिक सरल है। इंदिरा गांधी को ‘हिटलर’ कहा गया।
इतिहास से वर्तमान को ढंकने से किसी का भविष्य कभी नहीं बन सकता।
किन्तु प्रयास ऐसा ही होता है। हो रहा है।
इतिहास या ऐतिहासिक पल भी दो तरह के होते हैं। एक जो घट चुकी हैं, अत्यंत प्राचीन हैं अर्थात् हिस्टॉरिकल। एक जो नई रची जा रही है, अभूतपूर्व हैं, आगे जाकर इतिहास बनेंगी। अर्थात् हिस्टॉरिक।
तो कांग्रेस ने मोदी को प्रत्युत्तर में औरंगजेब घोषित कर दिया।
क्या राष्ट्र को यह एक पल के लिए भी स्वीकार्य है?
कि इस 21वीं सदी के भारत में, विकास-विकास करके वोट मांगे जाएं। किन्तु नेता एक-दूजे को भयानक इतिहास के हत्यारे खलपात्रों के नाम से संवारें। टोपी-तिलक का निकृष्ट बिन्दु, निरन्तर चर्चा में लाएं? क्यों किसी दल को डर नहीं लगता जनता से?
जो सत्ता-लोभ में मदांध हैं - उन्हें क्यों भय होगा? महाभारत में शुक्राचार्य कहते हैं - मधु पाने का लोभी मनुष्य छत्ता देखकर यह नहीं सोचता कि इतनी ऊंचाई से गिर पड़ूंगा। निडर हो, मधुमत्त पुरुष वहां जाता ही है! यह बात अलग है कि कुछ को मधु मिलता भी तो है!