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Karnataka: कांग्रेस और JD(S) के पास 20 लिंगायत समुदाय के विधायक, BJP और येदियुरप्पा की नजर इन्हीं पर

3 वर्ष पहले
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बेंगलुरु. कर्नाटक में आज येदियुरप्पा के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने जा रही है। येदियुरप्पा राज्य के सबसे बड़े समुदाय लिंगायत से आते हैं। ऐसे में जबकि बीजेपी के पास पर्याप्त विधायकों का समर्थन नहीं है तो वह कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के लिंगायत विधायकों से आशा रख रही है। इसमें भी खास बात ये है कि कांग्रेस के पास 18 जबकि जनता दल सेक्युलर के पास 2 लिंगायत विधायक हैं। 

समर्थन की उम्मीद आखिर क्यों?
- कांग्रेस के पास 78 जबकि जनता दल सेक्युलर के पास 38 विधायक हैं। कांग्रेस जनता दल सेक्युलर के नेता एचडी. कुमारस्वामी को सीएम बनाने के लिए तैयार है और इसका प्रस्ताव राज्यपाल तक भी पहुंचा चुकी है। 
- अब एक और खास बात। जनता दल सेक्युलर के नेता कुमारस्वामी राज्य के वोक्कलिगा समुदाय से आते हैं। अगर वो इस समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं तो दूसरी तरफ येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं। 
- यहां ये जान लेना जरूरी है कि लिंगायत समुदाय की जनसंख्या वोक्कलिगा की तुलना में काफी ज्यादा है। 
- माना जा रहा है कि कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के लिंगायत विधायक दोनों दलों के गठबंधन से काफी नाराज हैं। इसकी वजह ये है कि दोनों दलों ने चुनाव के बाद गठबंधन किया। अगर ये पहले हुआ होता तो शायद ये नाराजगी ना होती। 
- सवाल ये है कि 78 विधायक होने के बावजूद भी कांग्रेस ने आखिर जनता दल सेक्युलर को सीएम पद क्यों ऑफर किया? इसकी वजह बिल्कुल साफ है। कांग्रेस किसी भी कीमत पर बीजेपी को रोकना चाहती थी। इसीलिए, उसने जनता दल को आगे रखकर सियासी चाल चली। 

कितना ताकतवर लिंगायत समुदाय
- कर्नाटक में लिंगायत करीब 17% हैं। अभी तक इन्हें अगड़ी जातियों में गिना जाता रहा। ये राज्य की करीब 100 सीटों पर असर डालते हैं। 
- 224 सदस्यों वाली राज्य की विधानसभा में 52 विधायक लिंगायत हैं। करीब 800 साल पहले बासवन्ना नाम के समाज सुधारक थे। उन्होंने जाति व्यवस्था में भेदभाव के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। वेदों और मूर्ति पूजा को नहीं माना। बासवन्ना के विचारों को मानने वालों को ही लिंगायत और वीरशैव कहा जाता है। 
- हालांकि, लिंगायत खुद को वीरशैव से अलग बताते हैं। उनका कहना है कि वीरशेव बासवन्ना से भी पहले से हैं। वे शिव को मानते हैं, जबकि लिंगायत शिव को नहीं मानते। चुनाव से पहले राज्य की कांग्रेस सरकार ने नया दांव खेला था। उसने लिंगायत और वीरशैव समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने का सुझाव मंजूर कर लिया था। 
- सरकार के इस फैसले का वीरशैव लिंगायत समुदाय ने विरोध किया। उनका कहना था कि वीरशैव लिंगायत को लिंगायत से अलग धर्म घोषित किया जाए। येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं।

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