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कर्नाटक चुनाव में आ सकता है खंडित जनादेश

भरोसेमंद कद्दावर नेता के अभाव और सभी दलों के अनैतिक व्यवहार के कारण हताशा का माहौल।

राजदीप सरदेसाई | Last Modified - May 11, 2018, 09:50 AM IST

कर्नाटक चुनाव में आ सकता है खंडित जनादेश
बेशक कर्नाटक भारत का सबसे सुंदर राज्य है। कुछ ही राज्य इसकी समृद्ध विविधता का मुकाबला कर सकते हैं। कारवार के अद्भुत समुद्र तट से लेकर कूर्ग की अछूती हरियाली, बांदीपुर के वन्यजीवन से कावेरी डेल्टा के वैभव तक कर्नाटक ही मूल देवभूमि है। दुर्भाग्य से कर्नाटक की राजनीति इसके प्राकृतिक सौंदर्य से एकदम उलट है। राजनीति तो देश के किसी भाग में सुंदर नहीं है लेकिन, कर्नाटक में यह खासतौर पर भद्दी और भ्रष्ट हो गई है। बड़े भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि में जाति व समुदाय की पहचान से कर्कश हो चुका राजनीतिक मौहाल चुनाव का विशिष्ट चरित्र है। मतदाताओं के सामने उपलब्ध विकल्पों पर निगाह डालें तो आश्चर्य नहीं होगा कि कर्नाटक पॉलिटिकल लीग (केपीएल) भीड़ खींचने के मामले में उस चिन्नास्वामी स्टेडियम के निकट भी नहीं है, जहां कोहली, डिविलियर्स आदि का उत्साह बढ़ाने वाले उमड़ पड़ते हैं।
मुख्यमंत्री पद के तीन प्रमुख दावेदारों को ही लीजिए। कांग्रेस के मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को गर्व है कि उन्होंने राज्य को पांच साल स्थिर सरकार दी। वे यह भुला देते हैं कि इस वास्तविकता का अहसास होने में उन्हें चार साल लग गए कि वे ही राज्य के सर्वेसर्वा हैं। आखिरी वर्ष में वे अर्नाल्ड श्वाजनेगर जैसी एक्शन में आए और ‘गरीब हितैषी’ और किसान हित की कई घोषणाएं कर दीं। जिनमें से इंदिरा कैंटीन और सस्ते चावल की योजना ‘अन्न-भाग्य’ ने कांग्रेस को उम्मीद दी है कि वे शाह-मोदी महारथ को विंध्य के दक्षिण में रोक देंगे। फिर चुने जाने के लोभ और सत्ता-विरोध के इतिहास ने उन्हें जड़ता से बाहर आकर कांग्रेस को पुनर्जीवित और अपनी छवि चमकाने पर मजबूर किया।
भाजपा के ‘चेहरे’ बीएस येदियुरप्पा भी उस उम्र में शाश्वत युवावस्था का अमृत खोजने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिस उम्र में उनकी पार्टी 75 वर्ष से ऊपर के किसी भी शख्स को ‘मार्गदर्शक मंडल’ की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना से धमकाती है। दस साल पहले उन्होंने विपक्ष का सफाया कर दक्षिण में भाजपा की पहली बहुमत वाली सरकार बनाई थी। उस जनादेश का दुरुपयोग हुआ: पांच साल में भाजपा ने तीन मुख्यमंत्री दिए, जबकि खुद येदियुरप्पा लोकायुक्त के अभियोग के बाद जेल भेज दिए गए थे। वे पार्टी का चेहरा बनकर लौटे हैं उससे शक्तिशाली लिंगायत समुदाय पर भाजपा की निर्भरता उजागर होती है। साथ में यह भय भी जाहिर है कि विद्रोही येदियुरप्पा ज्यादा खतरनाक सिद्ध होंगे।
तीसरे दावेदार तो और भी ज्यादा विचित्र राजनीतिक शख्सियत हैं। एचडी कुमारस्वामी अपने पिता के बेटे हैं और जब तक एचडी देवेगौडा मैदान में हैं वे और जनता दल (सेकुलर) राजनीतिक खिलाड़ी रहेंगे। जद (एस) में अब सेकुलर जैसा कुछ नहीं है। यह बहुत पहले अपना प्रभाव खो बैठे मूल जनता दल प्रयोग के कई हिस्सों में से एक है। एक अकेली वोक्कालिंगा जाति, परिवार इस उपक्रम को चलाता है, जिसका रिकॉर्ड सबसे ऊंची बोली लगाने वाले के साथ सौदेबाजी करने का है। केवल मुख्यमंत्री पद के लिए प्रेरणाहीन विकल्प ने ही कर्नाटक के राजनीतिक परिदृश्य को इतना हताशाजनक बना दिया है। दलों के खुले अनैतिक व्यवहार को भी देखिए। बेल्लारी के खनन परिवार रेड्‌डी को वापस पार्टी में लाने के लिए हो रही भाजपा की आलोचना उचित ही है। ये वही हैं जिनके 35,000 करोड़ के खनन घोटाले ने पूर्ववर्ती सरकार में भाजपा के पतन को तेज किया था। वे अब लौट आए हैं। यह तो प्रधानमंत्री के उस दावे की खिल्ली उड़ाने जैसा है, जिसमें उन्होंने भ्रष्टाचार को जरा भी सहन न करने का दावा किया था।
लेकिन, कांग्रेस यदि ‘रेड्‌डी रिपब्लिक’ को ज़िंदा करने के लिए भाजपा की आलोचना कर रही है तो पार्टी के प्रत्याशियों में भी खनन से फायदा उठाने वाले ऐसे लोग हैं, जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। जब चुनाव जीतने की क्षमता ही टिकट बांटने का मानदंड हो तो कोई राजनीतिक दल नैतिक श्रेष्ठता का दावा नहीं कर सकता। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट पुष्टि करती है कि अपराध व पैसे की सांठगांठ ने कैसे राज्य की राजनीति पर कब्जा कर लिया है। मौजूदा विधायकों की संपत्ति में पांच साल में हुई औसत बढ़ोतरी देश में सर्वाधिक वृद्धि में शामिल है।
खनन से जुड़े दागी नेताओं ने राज्य की राजनीति का नैतिक दिवालियापन उजागर किया है तो जिस ढंग से लिंगायत जाति का कार्ड खेला जा रहा है वह वैचारिक रिक्तता को जाहिर करता है। जब मुख्यमंत्री चुनाव के ठीक पहले अचानक लिंगावतों को अल्पसंख्यक दर्जा देने का प्रस्ताव रखते हैं तो ऐसा नहीं कह सकते कि उन्हें रातोंरात सुधारक-दार्शनिक बासवन्ना के मूल्यों का पता लगा। पुराने किस्म के निष्ठुर समाजवादियों में प्रशिक्षित सिद्धारमैया तो बेशर्मी से ‘बांटों और राज करो’ की राजनीति आजमा रहे हैं। यह भाजपा के परम्परागत मतदाताओं में भ्रम फैलाने का प्रयास है। बेशक जिस ढंग से कर्नाटक और राष्ट्रीय स्तर के हर राजनेता ने राज्यभर के मठों व पीठों के स्वामियों को लुभाने का प्रयास किया है, वह यह बताता है कि धार्मिक लोगों की विश्वसनीयता राज्य के राजनेताओं से अधिक है। वैसे भी धार्मिक नेता, राजनीतिक नेताओं जितनी तेजी से पाला नहीं बदलते। उनमें भी चतुर लोग निश्चित ही सारे ही दलों को आशीर्वाद देने का प्रयास करते हैं!
यही वजह है कि कर्नाटक त्रिशंकु विधानसभा दे सकता है। यदि पूरे कर्नाटक को मथने वाला कोई मुद्‌दा न हो, कोई एक कद्दावर नेता न हो जिस पर सभी को भरोसा हो तो राज्य की राजनीति दरारें पड़े दर्पण जैसी ही दिखाई देगी। यही वजह है कि मतदान का प्रतिशत और आखिरी बूथ तक कनेक्टिविटी से ही यह तय होगा कि अंतत: केपीएल में शीर्ष पर कौन रहेगा और हो सकता है कि 15 मई के बाद हमें ‘सुपर ओवर’ देखने को मिले। इसीसे स्पष्ट होता है कि इस पल क्यों देवेगौडा और कुमारस्वामी के आवास पर कतार सबसे लंबी है, क्योंकि जब राजनीतिक भविष्य अनिश्चित हो तो सत्ता में पहुंचने वालों से अधिक महत्व किंगमेकर्स का होगा।
पुनश्च: उत्तर प्रदेश और बिहार में चुनावी नतीजों पर हर किसी की राय होती है। इसके विपरीत कर्नाटक के लोग मुखर नहीं होते। आखिरकार मुझे हुबली में एक मिठाई वाला मिला, जिसने मुझे एक पंक्ति का शानदार जवाब दिया, ‘हमारे राज्य में राजनीति 20-20 है। आपको चुनाव लड़ने के लिए 20 करोड़ रुपए चाहिए और चुनाव के बाद कौन मुख्यमंत्री बनेगा इसके लिए 20 विधायक चाहिए।’ (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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