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केजरीवाल, अराजकता, कथनी और करनी

8 वर्ष पहले
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सौतिक बिस्वास

बीबीसी संवाददाता

दलितों के महानायक और भारत के महान चिंतकों में से एक बीआर अंबेडकर ने 60 साल पहले \'अराजकता\' की निरर्थकता के बारे में बहुत खुलेपन के साथ अपने विचारों को सामने रखा था.

अंबेडकर ने कहा था कि भारत को \'क्रांति के रक्तरंजित तरीके\' को छोड़ देना चाहिए, सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को पाने के लिए सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह का रास्ता अपनाना चाहिए.

उन्होंने कहा था, \"जहाँ संवैधानिक रास्ते खुले हों, वहाँ असंवैधानिक तरीकों को सही नहीं ठहराया जा सकता है.\"

उनके अनुसार, \"यह तरीके और कुछ नहीं केवल अराजकता भर हैं और इन्हें जितना जल्दी छोड़ दिया जाए, हमारे लिए उतना ही बेहतर है.\"

लेकिन लगता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ऐसा नहीं सोचते.

धरना और प्रदर्शन

भ्रष्टाचार विरोधी आम आदमी पार्टी (आप) के नेता ने पिछले महीने दिल्ली के विधानसभा चुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन के साथ शुरुआत की है.

दिल्ली पुलिस (जो केंद्र सरकार के नियंत्रण में है) को दिल्ली सरकार के अधीन लाने के लिए की मांग उठाते हुए, वे हाल ही में सड़कों पर उतरे थे. कड़ाके की ठंड के बावजूद विरोध प्रदर्शन के दौरान वे खुले में सड़क पर ही सोए. जहाँ से उन्होंने दिल्ली सरकार का काम और फ़ाइलें प्रदर्शन स्थल से ही निकालीं, वहीं उनके समर्थकों और पुलिस के बीच झड़पें भी हुईं.

मंगलवार को देर शाम उनका धरना समाप्त हो गया.

1960 के दशक के आख़िर में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री अजॉय मुखर्जी कोलकाता के एक पार्क में अपनी ही गठबंधन सरकार के ख़िलाफ 72 घंटे की भूख हड़ताल पर बैठे थे. यह हड़ताल शांति स्थापित करने में सरकार की विफलता के विरोध में थी.

भारत ने इससे पहले निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री और मंत्रियों को सड़क पर प्रदर्शन का नेतृत्व करते नहीं देखा है.

\'अराजक राजनीति\'

धरने के दौरान संवाददताओं से बात करते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा, \"कुछ लोग कहते हैं मैं अराजक हूँ और अव्यवस्था फैला रहा हूँ. मैं सहमत हूँ कि मैं अराजक हूँ. मैं भारत का सबसे बड़ा अराजकतावादी हूँ.\"

कई लोगों का मानना है कि केजरीवाल की माँग जायज़ है. वे मानते हैं कि भ्रष्टाचार में संलिप्त दिल्ली की पुलिस राज्य के निर्वाचित नेताओं के प्रति जवाबदेह नहीं है, वह केंद्र सरकार को रिपोर्ट करती है. केजरीवाल के सहयोगी और आप के प्रवक्ता योगेन्द्र यादव इसे दिल्ली के प्रशासनिक ढांचे की विसंगति करार देते हैं.

दो मुख्य राष्ट्रीय पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी की भी लंबे समय से माँग रही है कि दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के प्रति जवाबदेह बनाया जाए, लेकिन कुछ अज्ञात कारणों से यथास्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ. केजरीवाल को विश्वास है कि सड़क पर प्रदर्शनों से व्यवस्था में बदलाव संभव है.

भारत के प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव जो पिछले साल केजरीवाल से जुड़े हैं, पूछते हैं- \"क्यों नहीं?\" सड़कों पर प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा हैं. प्रतिवाद आमतौर पर सड़कों पर ही होता है. कार्रवाई महत्वपूर्ण है. यह अराजकता नहीं है.\"

लेकिन प्रदर्शन की आलोचना करने वाले लोगों का मानना है कि सरकार में रहते हुए ऐसे प्रदर्शनों से केजरीवाल और उनकी पार्टी लोगों के बीच लोकप्रियता खो सकती है.

आम आदमी पार्टी ने मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के प्रति लोगों के मोहभंग होने को भुनाया है. कई लोग इन पार्टियों को अनैतिक, स्वार्थी और भ्रष्ट मानते हैं.

उधर माना जा रहा है कि \'आप\' ने राजनीति में युवा, आदर्शवाद, विश्वसनीयता, कल्पना और ऊर्जा का प्रवाह किया है.

\'आप\' का भविष्य?

भारत के 18 राज्यों में किए गए एक ताज़ा सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि आधे से अधिक वोटर केजरीवाल की पार्टी (आप) को जानते हैं और करीब 18 फ़ीसदी लोगों में पार्टी को वोट देने का रुझान पाया गया है.

कई लोगों का मानना है कि इतने अहम चुनावी फ़ायदे के बाद \'आप\' 2014 में ऐसी पार्टी के रूप में उभर सकती है, जिस पर सभी की नज़र होगी. लेकिन सड़कों पर ऐसे प्रदर्शनों के कारण वह अपनी लोकप्रियता और चुनावी फ़ायदा गंवा सकती है.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा कहते हैं, \"उनको प्रदर्शन करने का निर्णय काफ़ी सोच-विचार के बाद करना चाहिए. निश्चित रूप से संवैधानिक पद ग्रहण करने के बाद इतनी जल्दी इस तरह का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए.\"

भारत में अराजकता के समर्थक मिलने की संभावना कम है. लोग स्थायित्व पसंद करते हैं, यहाँ की राजनीति काफ़ी केंद्रीकृत है.

इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि केजरीवाल की पार्टी \'गेम चेंजर\' बनेगी या चार दिन की चाँदनी बनकर रह जाएगी.

योगेंद्र यादव कहते हैं, \"हम अनुभवहीन हैं. हम ग़लतियां कर सकते हैं. अपने समर्थन को ज़्यादा आंकने का ख़तरा है. लेकिन दिल्ली पुलिस के मसले पर होने वाला प्रदर्शन एक छोटा सा हस्तक्षेप है. हमारी राजनीति और हमारा अस्तित्व इससे कहीं बढ़कर है.\"

आख़िर में करनी ही कथनी पर भारी पड़ती है.

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