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3 चरणों में हुआ चंद्रावती की खुदाई का कार्य, संग्रहालय के बिना खुले में पड़ी है पुरा संपदा

3 वर्ष पहले
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पुरातत्व विभाग एवं जनार्दनराय नागर विद्यापीठ उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में तीन चरणों में हुई पुरानगरी चंद्रावती के खनन निकली पुरा संपदा संग्रहालय मरम्मत कार्य पूरा नहीं होने से खुले आसमान तले पड़ी खराब हो रही है। शहर के निकट परमार वंशजों की राजधानी रही चंद्रावती में पुरातत्व विभाग ने तीन चरणों में खुदाई कराई थी। इसके बाद इस क्षेत्र में सामान्य रूप से चल रहा संग्रहालय अब रखरखाव व मरम्मत के अभाव में पूरी तरह से जर्जर हो चुका है। पुरातत्व मूर्तियों को सुरक्षित प्लेटफॉर्म पर रखे जाने के बाद अब अत्याधुनिक तरीके से इसे बनाने के लिए तोडफ़ोड़ का काम चल रहा है, जिसके कारण मूर्तियां खुले आसमान तले खराब हो रही है।

इसी तरह संग्रहालय को बनाने का काम दो साल में पूरा नहीं हो पाया है। नए संग्रहालय के लिए किया जा रहा काम अभी तक पूरा नहीं हो सका है। अभी तक यह भी तय नहीं है कि पूर्व में नए संग्रहालय के हॉल में बड़ी-बड़ी खिड़कियां थी इन खिड़कियों को भी चुनाई कर बंद कर दिया गया है। अभी फर्श की पॉलिस का काम चल रहा है, लेकिन यह काम भी कब पूरा होगा इसकी कोई समय सीमा नहीं है। पुराना संग्रहालय पूरी तरह अपना अस्तित्व खो चुका है, जिस जगह खुदाई की जानी थी उस जगह पर टीन शेड बना दिया गया, जिसे ना पुरातत्व विभाग ने मुड़कर देखा और नहीं प्रशासन जनप्रतिनिधियों ने इसकी सुध ली। पुरातत्व महत्व की मटके व अन्य सामान जो भी निकले थे वह सब पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं टीन शेड का पतरा भी लोग निकाल कर ले गए हैं।

दो साल बाद भी सरकार नहीं करा सकी संग्रहालय का मरम्मत कार्य, खुले आसमान तले पड़ी संपदा हो रही खराब

तीन चरणों में हुआ था चंद्रावती का खनन

2014 में 1 जनवरी से 16 मार्च करीब 47 दिन

आबूरोड. खुले में पड़ी खुदाई में निकली पुरा संपदा।

दो साल से पूरा नहीं हुआ संग्रहालय का काम

तीन चरण की खुदाई में चंद्रावती के खनन के बाद दर्शकों को वर्तमान में देखने के लिए कुछ भी नहीं मिलता। क्योंकि, संग्रहालय के रखरखाव के धीमे कार्य के कारण गत दो सालों से न तो संग्रहालय बना और नहीं कुछ हो सका। इस क्षेत्र के अवलोकन के लिए पथ वे, लाइट लगाने समेत अन्य कार्य किए जा रहे हैं यह काम भी कब तक पूरे होंगे, यह कहा नही जा सकता। चंद्रावती क्षेत्र को पहचान दिलाने के लिए ना तो यहां के अधिकारी प्रशासनिक अमला जनप्रतिनिधि कोई भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहा। तीन चरणों में कई महत्वपूर्ण धरोहरें सामने आई है। लेकिन कार्य बंद होने के बाद इनका रखरखाव नहीं हो रहा। खुदाई में निकले किले व मटके के साथ घरों की संरचना आदि को निकाले जाने के बाद इसकी सुरक्षा नही की जा सकी।

2015 में 27 दिसम्बर से 4 मार्च करीब 67 दिन

2016 में 29 दिसम्बर से मार्च करीब 61 दिन

पर्यटन के रूप में विकसित करने का दावा, हकीकत सूचना बोर्ड भी हुआ धुंधला खुदाई के दौरान चंद्रावतीनगरी को पर्यटन के रूप में विकसित करने के दावे किए गए थे, लेकिन हकीकत यह है कि हाईवे पर लगा सूचना बोर्ड भी धुंधला हो चुका है। अंग्रेजी बबूल ने इस पूरे क्षेत्र कोचपेट मे ले लिया है अब यहां पता ही नहीं चलता कि कभी क्षेत्र की खुदाई भी हुई थी। इस क्षैत्र को पर्यटन के रूप में विकसित करने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग पर सूचना पट्ट लगाने, आबूरोड रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन पर सूचना पट्ट लगाने जैसे कार्यों का भी किया जाना था, लेकिन एक भी काम नहीं हुआ। चंद्रावती के प्रवेश द्वार पर चंद्रावती व अन्य सूचना भी मिट चुकी है।

संरक्षण की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की

चंद्रावती में खनन के बाद यहां से अंग्रेजी बबूल व घास को पनपने नहीं दिया जाना चाहिए। इसके लिए स्थानीय स्तर पर कार्य किए जाने चाहिए, ताकि चंद्रावती संरक्षित हो सके। सालभर यह लोगों के अवलोकन के लिए उपलब्ध रहे, इसके लिए सुविधाओं का विकास जरुरी है। -विनित गोधल, अधीक्षक उत्खनन, पुरातत्व विभाग, जयपुर

विकसित करने का काम चल रहा है

करीब एक करोड़ की लागत से संग्रहालय को विकसित करने का काम चल रहा है। संग्रहालय में डिस्पले का काम, विद्युतिकरण, बाहर व अंदर के परिसर को विकसित कराया जा रहा है। खनन में निकली मूर्तियों व सामग्री डिस्पले व अन्य तरीके से प्रदर्शन किया जाएगा, ताकि आमजन इसकी जानकारी ले सके। सूचना बोर्ड भी लगाए जाएंगे। -बाबूलाल मौर्य, अधीक्षक, पुरातत्व विभाग, जोधपुर

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