अजमेर| तीर्थ क्षेत्र नारेली में मुनि सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कहा कि हमें यदि कोई शुभ कार्य करने का अवसर प्राप्त हो तो उस कार्य को अपने जीवन का अंतिम पुण्य कार्य मानकर उत्साह, उमंग और भक्ति के साथ करना चाहिए, क्योंकि जीवन क्षणभंगुर जल की बूंद की तरह है पता नहीं कब क्या हो जाए। हमारी क्रिया जीवन में तभी महत्वशाली होती है जब हम उस पुण्य क्रिया को महत्व दे अन्यथा कोरी क्रिया संपूर्ण फलदायी नहीं होती। जीवन का मूल सिद्धांत है कि जो जीव जैसा कर्म करता है वैसा उसे फल भोगना ही पड़ता है। जैसा कर्म सिद्धांत का उल्लेख जैन दर्शन में है वैसा अन्य किसी दर्शन में नही। गुरु का आशीर्वाद प्राप्त होते ही प्राणों में उर्जा का संचार होता है। दिगम्बर संत नदी की तरह सतत प्रवाहमान रहकर संपूर्ण धरा पर नंगे पैर पैदल विचरण करते है। ज्ञान का दान ही सबसे बड़ा दान है वही वरदान है अन्य दान तो लघु दान है। गुरू के वचन सुनना मात्र ही कार्यकारी नहीं बल्कि गुनना भी आवश्यक है। अन्यथा सुना ही कपूर की तरह उड़ जाता है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है अर्थात जब हम किसी एक लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते है तो उसके लिए अन्य इच्छाओं को तिलांजलि देना अत्यंत आवश्यक है।