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लेखन में लिपि का प्रयोग हो, लेकिन भाषा खंडित नहीं होनी चाहिए : व्यास

3 वर्ष पहले
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देश में साहित्यिक, सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना के लिए निरंतर कार्यरत कोलकाता स्थित प्रभा खेतान फाउंडेशन द्वारा साहित्य और लेखकों को मंच प्रदान करने के उद्देश्य से की जा रही पहल “कलम’ का आयोजन अजमेर में किया गया। इसके अंतर्गत हिंदी साहित्य जगत के सत्य व्यास कला व साहित्य प्रेमियों से रूबरू हुई। सत्य व्यास से चर्चा डाॅ. विमलेश शर्मा ने की।

अपनी साहित्यिक यात्रा के बारे में बातचीत के दौरान सत्य व्यास ने कहा कि आजकल का लेखन बहुत बदल गया है। हिंदी लेखन में विभिन्न लिपियों का प्रयोग किया जाने लगा है, लेकिन लिपि की वजह से भाषा की गरिमा खंडित नहीं होनी चाहिए। एक किताब में लेखक का जिम्मा सिर्फ लेखन है, बाकी उसकी सफलता में प्रकाशन और संपादक की मुख्य भूमिका होती है। कार्यक्रम के दौरान सीपी देवल, श्याम माथुर, अनंत भटनागर, रासबिहारी गौड़ सहित कई साहित्यप्रेमी मौजूद थे। प्रभा खेतान फाउंडेशन की इस कलम सीरीज के प्रस्तुतकर्ता श्री सीमेंट है तथा वी-केयर एवं अहसास अजमेर इसके सह-भागीदार है। अजमेर से पूर्व, कलम सीरीज के कार्यक्रम हैदराबाद, बेंगलुरू, रायपुर, पटना, जयपुर, उदयपुर, आगरा, दिल्ली इत्यादि में आयोजित हो चुके हैं।

सत्य व्यास का परिचय
सत्य व्यास लेखकों की वर्तमान पीढ़ी से हैं और नई वाली हिंदी प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय बीएचयू से कानून स्नातक सत्य व्यास हिंदी लेखन के उस लोक से आते हैं जिनकी अकादमिक पृष्ठभूमि हिंदी नहीं है। सत्य व्यास का पहला उपन्यास बनारस टॉकीज एक बेस्टसेलर है, जिसके पिछले दो सालों में 10 संस्करण और कई रीप्रिंट आ चुके हैं। उपन्यास को अमेजन इंडिया द्वारा 2015 की शीर्ष 5 हिंदी पुस्तकों में से एक के रूप में चुना गया है। 2017 में इसी किताब को दैनिक भास्कर समूह द्वारा द्वारका प्रसाद अग्रवाल सम्मान से विभूषित किया गया। दिल्ली दरबार उनका दूसरा उपन्यास है, जिसे 2017 के सर्वे में बेस्ट सेलिंग हिंदी उपन्यास के लिए प्रथम स्थान मिला। एक धुर पाठक, एक ब्लॉगर और अनगढ़ कवि सत्य व्यास फिलहाल अपनी तीसरी किताब “चौरासी’ के साथ कुछ पटकथाओं पर काम कर रहे हैं। फिल्म नगरी के खो चुके लोगों पर शोध इनका प्रिय विषय है। वे वर्तमान में राउरकेला, ओडिशा में रहते हैं।

बनारस टॉकिज के बारे में जानकारी देते लेखक सत्य व्यास।

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