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बकाया भुगतान नहीं किया, खानपुरा एसटीपी बंद

3 वर्ष पहले
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शहर में 40 हजार सीवरेज कनेक्शन के लिए बना 20 एमएलडी सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) ने काम करना बंद कर दिया है। गंदे पानी का ट्रीटमेंट करने वाली मशीनें अब थम गई हैं, यहां जमा नालों का गंदा पानी बदबू मारने लगा है। क्षेत्र में पर्यावरण प्रदूषण का खतरा मंडराने लगा है। इन हालातों के पीछे वजह है एसटीपी का ऑपरेशन एवं मेन्टेनेंस करने वाले ठेकेदार को बकाया भुगतान नहीं हुआ है।

वर्ष 2013 में एडिशनल चीफ सेक्रटरी की अध्यक्षता वाली हाई लेवल कमेटी के निर्णय को दरकिनार करते हुए भुगतान के लिए राज्य सरकार से मार्गदर्शन मांगा जा रहा है। जिला कलेक्टर गौरव गोयल ने निगम अधिकारियों को तलब किया है। वर्ष 2006 से 2009 के बीच खानपुरा एसटीपी बनकर तैयार हुआ था। शुरूआत से यह विवादों में रहा। पहले सीवरेज कनेक्शन हीं हुए, तब तक इसका संचालन नहीं हो सकता। जब कनेक्शन शुरू हुए तो ठेकेदार से भुगतान को लेकर विवाद शुरू हो गया।

बिजली का बिल तो नगर निगम ने जमा करवा दिया लेकिन ठेकेदार का भुगतान नहीं किया। वर्ष 2013 में जयपुर में एसीएस स्तर पर हाई लेबल कमेटी ने निर्णय लिया कि अनुबंध की तय शर्तों के आधार पर ठेकेदार को 50 प्रतिशत भुगतान कर दिया जाए, जिसके चलते ठेकेदार को 65 लाख रुपए का भुगतान भी किया गया। ठेकेदार का तर्क है कि वह 2015 तक प्लांट का संचालन कर रहा था। अक्टूबर 2016 में जब निगम अधिकारी प्लांट देखने गए तो पता चला कि केबल जली हुई थी, सबमर्सिबल पंप खराब थे। शेष यूनिट भी बंद ही थी। ठेकेदार ने शर्त रखी कि यदि निगम इसका अधिग्रहण कर लेता है तो इसे ठीक कर देगा। निगम ने कमेटी बनाकर जांच करने के बाद फरवरी 2017 में टेकओवर कर लिया।

वर्ष 2006 से 2009 के बीच खानपुरा एसटीपी बनकर तैयार हुआ था

2016

निगम अफसरों ने देखी जली केबिल, खराब हो चुके पंप

2017

जांच के लिए कमेटी बनी और प्लांट को किया टेकओवर

कलेक्टर ने माना प्लांट तो चलना ही चाहिए

खानपुरा एसटीपी प्लांट बंद नहीं होना चाहिए। इसका हर कीमत पर संचालन होना चाहिए। यदि प्लांट बंद हो गया है तो वहां जमा गंदा पानी पर्यावरण को प्रदूषित करने लगेगा। इस संबंध में निगम अधिकारियों को बुलाकर आ रही परेशानी को दूर किया जाएगा। -गौरव गोयल, जिला कलेक्टर

ये किया था कमेटी ने निर्णय

एसटीपी में स्टेडा सिस्टम लगा हुआ है। कंट्रोल रूम में इस सिस्टम के आधार पर पंप चल रहा है या नहीं, पानी का फ्लो सही है या नहीं इसकी जानकारी मिल जाती थी। यह सिस्टम खराब पड़ा हुआ था। ठेकेदार ने इसे ठीक करवाया। निगम की जांच कमेटी ने निर्णय लिया कि सितंबर 2013 से अक्टूबर 2016 तक भुगतान राशि का 50 प्रतिशत दिया जाए, जबकि जनवरी 2016 से मई 2017 तक प्लांट बंद रहा, ऐसे में कोई भुगतान नहीं किया जाए और अधिग्रहण के बाद किए गए संचालन का भुगतान कर दिया जाए। निगम प्रशासन ने ठेकेदार को भुगतान ही नहीं किया।

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