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बालाकिला जंगल में ओलों से मोरों की मौत, लीवर में संक्रमण भी मिला

3 वर्ष पहले
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सरिस्का बाघ परियोजना के बफर जोन में आने वाले बालाकिला जंगल में सैकड़ों मोरों की मौत हो गई है। जंगल में बड़ी संख्या में मृत मोर पड़े हैं। कई जगह मोरों के अवशेष पड़े हैं। मोरों की मौत का सिलसिला करीब 20 दिन से चल रहा है। मोरों की मौत के कारण पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन पशु चिकित्सक ओलावृष्टि से प्रभावित मोरों की मौत होना बता रहे हैं। पोस्टमार्टम में कुछ मोरों में लीवर संक्रमण भी मिला है। मोरों की मौत मुख्य रूप से बालाकिला, अंधेरी, सूरजकुंड, किशनकुंड, अंधेरी व सुगन होद सहित आसपास के जंगल में हो रही है। इन क्षेत्रों में कई बार ओलावृष्टि हुई है। अंधेरी और बालाकिला के जंगल में रविवार को भी कई मोर तड़पते मिले। मोरों में बीमारी इस कदर फैली है कि क्षेत्र के ज्यादातर मोर दम तोड़ चुके हैं। प्रभावित मोरों को चलने-फिरने में परेशानी होने के बाद वे एक ही स्थान पर घूम-घूमकर मर रहे हैं। मुंह से लार आने के बाद मोर अपनी गर्दन भी ठीक से नहीं संभाल पा रहे हैं। बीमार हुए कई मोरों को प्रतापबंध स्थित वन विभाग की चौकी पर रखकर इलाज किया जा रहा है। कुछ मृत मोरों का पशु चिकित्सालय में पोस्टमार्टम भी कराया गया है, लेकिन मौत के कारणों की जांच के लिए अभी तक सैंपल नहीं भेजा गया है। स्थानीय स्तर पर जांच की सुविधा नहीं है। प्रतापबंध वन विभाग नाके के फोरेस्टर जितेंद्र सिंह ने बताया कि पशु चिकित्सकों ने कई घायल मोरों की मौत का कारण लीवर में इंफेक्शन बताया है। यह संक्रमण किस कारण फैल रहा है, इसका अभी पता नहीं चल सका है। जिन मोरों का इलाज हो रहा है, वे ठीक भी हो रहे हैं और उन्हें जंगल में छोड़ा जा रहा है।

इस मामले में हालांिक जहरीले चुग्गे की कोई बात सामने नहीं आई है, लेकिन जिले में विभिन्न स्थानों पर कई बार जहरीला चुग्गा खिलाकर मोरों को मारने की घटनाएं सामने आती रही हैं। वनकर्मियों का मानना है कि अगर जहरीला चुग्गा डाला जाता तो अन्य पक्षियों पर भी उसका प्रभाव पड़ता, लेकिन अभी तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है।

अलवर. प्रताप बंध वन विभाग की चौकी के कमरे में हो रहा मोरों का इलाज।

अलवर. प्रताप बंध वन विभाग की चौकी के कमरे में हो रहा मोरों का इलाज।

अलवर. बालाकिला के जंगल में ओलों की मार से प्रभावित मोर तड़पता हुआ।

वाटर होल में डलवाई जाएगी लाल दवा

बालाकिला के जंगल व आसपास के क्षेत्र में स्थित वाटर होल में लाल दवा डलवाई जाएगी। दवा डलवाने का काम एक-दो दिन में शुरू किया जाएगा। अगर पानी में कोई संक्रमण है, तो लाल दवा से ठीक होने की उम्मीद है।

केवल मोर ही प्रभावित, अन्य पक्षी व वन्यजीव सुरक्षित

मोरों में फैली बीमारी पूरे सरिस्का जंगल में नहीं है। इस बीमारी की गिरफ्त में सिर्फ बालाकिला और इसके आसपास के जंगल के मोर ही आए हैं। दूसरे पक्षियों या वन्यजीवों में इस बीमारी का कोई असर अभी तक सामने नहीं आया है। ओलावृष्टि से प्रभावित होने के बाद मोर उड़ नहीं पाने की वजह से भी दम तोड़ रहे हैं।

इलाज के बाद ठीक हुए मोर फिर से जंगल में छोड़े

बफर जोन में ज्यादातर मोरों की ओलावृष्टि से प्रभावित होने के बाद मौत हुई है। वन विभाग की टीम ने रेस्क्यू कर कई मोरों का इलाज कराया। डॉक्टरों ने मोरों का विटामिन, मिनरल मिक्चर और एंटी बायोटिक देकर इलाज किया। कई मोर दो-तीन दिन में ठीक हो गए, जिन्हें फिर से जंगल में छोड़ा गया है। अगर इंफेक्शन होता तो दवा असरकारक नहीं होती। मोरों के पोस्टमार्टम में लीवर इंफेक्शन भी मिला है। -डॉ. अशोक जैन, उप निदेशक, बहुउद्देशीय पशु चिकित्सालय, अलवर

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