अलवर| जिलेभर की मस्जिदों में शुक्रवार को रमजान महीने के पहले जुमा की विशेष नमाज हुई। इस मौके पर देश में अमन चैन, तरक्की और खुशहाली के लिए दुआ मांगी गई। शाम को रोजा इफ्तार की दावत हुई। रोड नंबर दो स्थित जामा मस्जिद में दोपहर 1.45 बजे इमाम मौलाना मोहम्मद अनस ने नमाज अता कराई। जुमा की अजान के बाद तकरीर हुई। इसके बाद खुतबा पढ़ा गया। नमाज के बाद दुआ मांगी गई। दाउदपुर मदरसा स्थित मस्जिद में दोपहर 2.15 बजे इमाम मौलाना मोहम्मद अमजद ने नमाज अता कराई। शहर में नंगली मोहल्ला, प्रतापबंध व छठी मील स्थित मस्जिदों में भी नमाज अदा की गई। शाम को हुई इफ्तार दावतों में रोजेदारों ने खजूर, पानी व फलों से रोजा खोला। जामा मस्जिद के इमाम अनस ने बताया कि इस बार दो दिन रमजान महीने का सबसे बड़ा रोजा होगा। दोनों दिन रोजे की अवधि 15.32 घंटे की होगी। 14 व 15 जून को रोजा अलसुबह 3.50 बजे शुरू होकर शाम 7.22 बजे समाप्त होगा।
अलवर. रोड नंबर दो स्थित जामा मस्जिद के पार्क में नमाज अता करते नमाजी।
रमजान के महीने में खुल जाते हैं जन्नत के दरवाजे, गुनाह माफ होते हैं
अलवर| इस्लाम धर्म का पवित्र महीना रमजान शुरू के साथ ही घरों में आध्यात्मिक माहौल बना हुआ है। इबादत का महीना होने के कारण समझदार (बालिग) व्यक्ति रोजा रख रहे हैं। नियमों का पूरा ध्यान रखा जा रहा है कि रोजा टूट नहीं जाए। पुरुष ही नहीं महिलाओं ने भी रोजे रखे हुए हैं।
सातवीं में पढ़ती थी, तब से शुरू किया रोजे रखना
संजय नगर काॅलोनी निवासी 22 वर्षीय खुर्शीदा पिछले 10 वर्षों से रमजान के महीने में रोजा रख रही है। खुर्शीदा का कहना है कि भाग-दौड़ की जिंदगी में मन की शांति छिन गई। इबादत से मन शांत रहता है। घर में आध्यात्मिक माहौल रहता है। जब मैं 7वीं में पढ़ती थी, तब से रोजा रखना शुरू किया। चार साल पहले शादी हुई, ससुराल आई तो यहां भी पीहर जैसा माहौल मिला। मेरी सास, ननद और जेठानी भी रोजा रखती हैं।
रुखसाना बोली-हर दुआ कबूल होती है
रंगभरियों की गली निवासी 41 वर्षीय रुखसाना का कहना है कि वे जब आठ साल की थीं, तब से रमजान के महीने में रोजा रखती आ रही हैं। रमजान में मांगी गई हर दुआ कबूल होती है। रोजेदार को नियमों का पालन करना होता है। गर्मी के मौसम में दिन में पानी के बिना रहना मुश्किल होता है लेकिन अल्लाह ताला शक्ति प्रदान करता है। दिन में पांच बार नमाज पढ़नी होती है। जुमा के अलावा तरावीह की विशेष नमाज होती है। कुरान शरीफ पढ़ी जाती है।
रोजा रखने का मतलब केवल भूखा-प्यासा रहना नहीं
रंगभरियों की गली निवासी 60 साल की रजिया बेगम कहती हैं कि रमजान में रोजा रखने का मतलब केवल भूखा-प्यासा रहना नहीं है। रोजा रुकने का नाम है। यह बुराई करने, झूठ बोलने, गलत नजर डालने से रोकता है। हमें लगता है कि अल्लाह सब देख रखा है। रमजान में जन्नत के दरवाजे खुल जाते हैं। इबादत का कई गुना ज्यादा फल मिलता है। गुनाह माफ हो जाते हैं। सहरी के लिए घर के सभी लोग तड़के 3 बजे नींद से जागते हैं। खाना बनाया जाता है। नियत बांधते हैं, खाना खाया जाता है। इसके बाद रोजा शुरू हो जाता है। शाम को पिंड खजूर से रोजा खोला जाता है। महिलाएं व लड़कियां घर पर नमाज पढ़ती हैं। टीवी भी नहीं चलाते हैं। मैं 15 साल की थी, तब से रोजे रख रही हूं।
सही मार्ग पर चलना सिखाते हैं रोजे : रूबिया खान
जिला पार्षद रूबिया खान का कहना है कि रोजे इस्लाम मजहब के पांच अरकानों में से एक है। रोजे की शुरुआत युकुम रमजान हिजरी संवत 2 में हुई। रोजे का मतलब है कि इंसान तमाम जिंदगी के लिए नेक व परहेजगार बन जाए। इसका मतलब शरीर को परेशानी देना नहीं है बल्कि अल्लाह से डरना व उसकी नाफरमानी से बचना है। इसी महीने में कुरान ए पाक उतारा गया। शैतान कैद कर दिया जाता है। नेक नियत से रोजा रखने से गुनाह माफ हो जाते हैं।