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रिटायर सैनिक को मौत के 1 माह बाद कोर्ट में पेश बता केस लड़ाया फिर हड़प ली जमीन
धीरेंद्र गुप्ता | शाहजहांपुर
सेना के एक अफसर अपना जीवन मातृभूमि की रखवाली में खपा दिया। रिटायरमेंट के बाद उसकी मौत हो गई। बेटा फौज में रहकर सरहदों की सुरक्षा करता रहा, इस बीच गांव में उनकी अपनी जमीन कुछ लोगों ने गलत तरीके अपनाकर अपने नाम करवा ली । जब उसे सच पता लगा तो वह पुलिस और प्रशासन से कहता फिर रहा है कि मेरे पिता के निधन के बाद कुछ लोगों ने किसी और को फर्जी तरीके से मेरा पिता बनाकर कोर्ट में पेश करके जमीन को अपने नाम करवा लिया है , मुझे न्याय चाहिए। उसने अपने पिता की मृत्यु के सारे दस्तावेज भी पेश कर दिए पर कोई नहीं सुन रहा। केस सुन रहे उपखंड मजिस्ट्रेट ने फर्जी व्यक्ति को परिवादी मान फैसला भी कर दिया। सिलसिला यहीं नहीं थमा, सैनिक को पता चलने के बाद पुलिस के पास पहुंचा तो वहां केस दर्ज नहीं किया गया। वह हाई कोर्ट से आदेश लाया तो मामला दर्ज कर जांच ठंडे बस्ते में डाल दी गई।
सरकारी सिस्टम की पोल खोलने वाला यह मामला सक्तपुरा निवासी सेवानिवृत्त सैन्य कर्मी सुरेंद्र यादव का है। सुरेंद्र के पिता बलबीर पुत्र सोलुराम आर्मी में पैरा कमांडर थे। उनकी मृत्यु 25 अक्टूबर 2000 को हो गई। ग्राम पंचायत सक्तपुरा-बावद 31 अक्टूबर 2000 को बलबीर का मृत्यु प्रमाणपत्र भी जारी किया था। बलबीर की मृत्यु के बाद पड़ोसी जगदीश पुत्र श्रीराम ने सैनिक की एक बीघा दो बिस्वा अपने नाम कराने के लिए 7 नवंबर 2000 को मुंडावर कोर्ट में जमीन पर हकदारी का दावा पेश किया। बलबीर की मौत हो चुकी थी और इसलिए कोई प्रतिवादी वकील नहीं आने से यह दावा स्वीकार नहीं हुआ। तो 20 नवम्बर को एडवोकेट बस्तीराम ने बलबीर के हस्ताक्षर से वकालतनामा प्रस्तुत कर दिया। कोर्ट ने बलबीर के नाम जवाब दावा का नोटिस जारी किया। इस पर बस्तीराम ने 22 जनवरी 2001 को प्रतिवादी बतौर बलबीर सिंह को प्रस्तुत कर जवाब दावा दाखिल किया। जबकि बलबीर सिंह की 25 अक्टूबर 2000 को ही मौत हो चुकी थी। मामले की सुनवाई तत्कालीन एसडीएम ओटाराम मीणा कर रहे थे। उन्होंने बिना किसी जांच पड़ताल प्रकरण में जगदीश पुत्र श्रीराम के पक्ष में 30 जुलाई 2002 को केस डिक्री कर दिया। तब तक उक्त लोगों ने बलबीर के परिवार को भनक तक नहीं लगने दी।
मैं अलवर एसपी से अलवर जाकर मिल चुका हूं। उन्होंने 10 दिन में फैसला करने की बात कही थी, लेकिन अब तक मुझे इंसाफ और मेरा हक नहीं मिला है। सुरेन्द्र यादव, सेवानिवृत्त सैनिक (मृतक बलबीर के पुत्र)
मृतक बलबीर का पुत्र सुरेन्द्र
ग्राम पंचायत द्वारा जारी बलबीर का मृत्यु प्रमाणपत्र।
15 साल बाद बलबीर के परिजनों को लगा पता
बलबीर का पुत्र सुरेन्द्र यादव 31 मार्च 2010 को भारतीय सेना से सेवानिवृत्त होकर लौटे और माणका गांव में खसरा नंबर 31 की एक बीघा दो बिस्वा पैतृक जमीन पर खेती करते रहे। दो वर्ष पहले जब सुरेंद्र किसान क्रेडिट कार्ड बनवाने के लिए जरूरत पड़ने पर जमाबंदी के लिए पटवारी के पास पहुंचे। तो पटवारी ने कहा कि जमीन से उनका कोई लेना-देना ही नहीं है। उक्त जमीन जगदीश के नाम है। सुनते ही सुरेंद्र के पैरों तले से जमीन खिसक गई। वे जगदीश व दोनों वकीलों के खिलाफ मामला दर्ज कराने मुंडावर थाने पहुंचे तो पुलिस ने सहयोग नहीं किया। हारकर उन्होंने इस्तगासे से जगदीश, एडवोकेट बस्तीराम एवं एडवोकेट सतीश के खिलाफ 10 नवम्बर 2017 को धोखाधड़ी का मामला दर्ज करवाया।
हाईकोर्ट ने 2 माह में मांगी रिपोर्ट, 3 माह बाद भी पुलिस ने नहीं भेजी
दर्ज मामले में पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की तो सुरेंद्र ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई। इस पर जस्टिस विजय कुमार व्यास ने 29 जनवरी 2018 को फैसला किया और मुंडावर पुलिस को 2 माह में कार्रवाई करने के आदेश दिए, लेकिन इस आदेश के 3 माह बाद भी पुलिस जांच की बात कह रही है। इससे पहले एक बाह मुंडावर थाना के तत्कालीन प्रभारी भरत सिंह ने तो एफआर ही लगा दी थी। अब जांच पुन: मुंडावर थानाधिकारी के पास लंबित है।
वकील का कहना-मौत से पहले मेरे पास आया बलबीर
मामले में एडवोकेट बस्तीराम का कहना है कि यह मामला काफी पुराना है। जब परिवाद हुआ तो दोनों ही पक्षकार फैसला करना चाहते थे, लेकिन बात नहीं बनी। बलबीर मेरे पास आया था। उसने मरने से पहले कुछ सादा एवं पाई पेपर पर अपने हस्ताक्षर किये थे। जिन्हें उनकी मौत के बाद कोर्ट मे पेश किया था। बलबीर को मृत्यु के बाद कैसे पेश करेंगे। उसे कोर्ट में पेश नहीं किया गया। एडवोकेट बस्तीराम यादव, मुंडावर एसडीएम कोर्ट