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‘लोहा कुट्ट’ से जातिवाद की जकड़न पर कुठाराघात

3 वर्ष पहले
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पंजाब नाटशाला में बैसाखी सेलिब्रेशन के तहत शनिवार को बलवंत गार्गी लिखित नाटक “लोहा कुट्ट’ का मंचन किया गया। थिएटर ग्रुप “रंगकर्मी मंच अमृतसर’ की इस पेशकारी को निर्देशित किया है प्रसिद्ध नाटककार मंचप्रीत ने। नाटक में समाज के भीतर फैले जातिवाद, दकियानूसी विचारधारा और युवा पीढ़ी के बीच बदलाव की सोच को पिरोया गया है।

नाटक की कहानी के मुताबिक एक लुहार परिवार के इर्दगिर्द घूमती है। लुहार की प|ी संती पति के साथ अपनी जिंदगी जैसे-तैसे बसर कर रही है? हालांकि उसके भी कई अरमान हैं लेकिन मां-बाप से मिली सीख कि पति देवता है और घर मंदिर ही परंपरा पर अपने सारे अरमान कुर्बान कर देती है और लोहा कूटने वाले लोहार के साथ तंगहाली की जिंदगी जी रही है।

लेकिन कहते हैं कि समय हमेशा एक सा नहीं रहता। बदलाव आता है तो काफी कुछ वह नहीं रहता जो पहले रहता है। ऐसा ही होता है लुहार दंपत्ति के साथ। उनकी बेटी पैदा होती है बानो। मां बेटी पर प्यार उड़ेल देती है। पिता भी उसे प्यार करता है। दोनों की ही कोशिश रहती है कि बेटी उनकी तरह से अभावों में न पले। खैर, बेटी बड़ी होती है और जब जवानी की दहलीज पर कदम रखती है तो उसे एक बड़ी जाति के लड़के से प्यार हो जाता है। दोनों युवा भी वही करते हैं जो प्यार होने पर आम युवा करते हैं। बानो लड़के के साथ घर से भाग जाती है। घर में कोहराम मच जाता है। लुहार दंपत्ति को समाज से ताने सुनने को मिलते हैं और वह लोग बेटी से मुख मोड़ लेते हैं। समय गुजरता जाता है और एक दिन मां को महसूस होता है कि बेटी ने नादानी तो की लेकिन अपनी ख्वाहिशों के चलते और आखिर में उसे माफ कर दिया जाता है। मंचप्रीत कहते हैं कि नाटक को 1944 के परिदृश्य में लिखा गया था लेकिन आज भी यह प्रासंगिक है। नाटशाला के संस्थापक जतिंदर बराड़ का कहना है कि भले ही आज हम तरक्की कर गए हैं लेकिन बेटियों के मामले में हमारी सोच अभी वहीं पर है। उनका कहना है कि यह नाटक उसी सोच पर कटाक्ष करता है।

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