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दुनिया में चार प्रकार के मनुष्य, बदलने न वाले, गतिमान, सद्-गति प्राप्त और विश्राम स्थिति वाले

3 वर्ष पहले
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चिन्मय वानप्रस्थ संस्थान की बैठक मालरोड स्थित होटल में हुई। इसमें मुख्य प्रवक्ता डाॅ. संजीव शर्मा मुख्य रूप से पहुंचे। उन्होंने ‘हमारे जीवन में वानप्रस्थ का महत्व’ पर बड़े ही सहज और सरल तरीके से चर्चा की।

कार्यक्रम का आरंभ पूज्य गुरुदेव के विग्रह के समक्ष दीप प्रज्वलित करके किया। इस दौरान भजन गायक स्वतंत्र कुमार ने ‘अंतर के पट खोल’ भजन गाकर भक्तिरस प्रवाहित किया। प्रो. एसएन जोशी ने बताया कि डॉ. शर्मा शास्त्रों के गहन ज्ञाता, बुद्धिजीवी और समाजसेवी हैं। इसमें तारक चैतन्य ने वानप्रस्थ क्या है, इस विषय पर चर्चा की। डाॅ. शर्मा ने कहा कि शास्त्रों, ऋषि मुनियों ने जीवन को जीने के बारे में बताया है। इसी जीवन प्रणाली को धारण करने से ही जीवन सुचारु और शांतिमय बन सकता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्यों के चार प्रकार देखने में आते हैं, एक वे जो बदलते नहीं। उनका जीवन जानवर सरीखा है। दूसरे वे जो गतिमान तो हैं, परंतु केवल स्वयं के लिए जीते हैं। तीसरे मनुष्य वे हैं जो सद्गति प्राप्त करते हैं। ऐसे लोगों की संख्या धीरे-धीरे क्षीण हो रही है। चौथे प्रकार के वे लोग हैं, जो विश्राम की स्थिति में रहते हैं।

जिन्होंने जीवन में सब कुछ प्राप्त कर लिया है, उन्होंने कहा कि हम लोग गृहस्थी बने रहना चाहते हैं साधनों को इकट्ठे करने में ही जीवन व्यतीत होता है। रामायण का युग स्वर्णिम था क्योंकि उस युग में सभी त्यागी थे, तभी सभी तरफ प्रसन्नता थी। महाभारत काल में दुर्योधन, धृतराष्ट्र के मोहग्रस्त होने को कारण ही भयंकर युद्ध हुआ। आज आवश्यकता है कि हम वानप्रस्थी होकर सभी इच्छाओं को संयमित कर समाज की निस्वार्थ सेवा करें।

चिन्मय वानप्रस्थ की बैठक के दौरान डाॅ. शर्मा ने कहा कि शास्त्रों, ऋषि मुनियों ने जीवन को जीने के बारे में बताया हैं। जिससे जीवन सुचारू और शांतिमय बन सकता।

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