पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • Local
  • Punjab
  • Amritsar
  • बाबा ने दिव्यांगों व पेड़ पौधों के लिए ठुकरा दिया था पद्मश्री

बाबा ने दिव्यांगों व पेड़-पौधों के लिए ठुकरा दिया था पद्मश्री

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
महाराष्ट्र के अमरावती जिले से संबंधित 70 वर्षीय शंकर बाबा पापड़कर मानव सेवा और पर्यावरण संभाल के मामले में देश ही नहीं बल्कि सारी दुनिया के लिए प्रेरणास्रोत हैं। वह 28 सालों से दिव्यांग और मंदबुद्धि बच्चों तथा दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधों का लालन-पालन करके इतिहास रच रहे हैं। सेवा में रुकावट न आए इसके लिए उन्होंने पद्मश्री सम्मान को भी ठुकरा दिया था। गुरु नगरी के दर्शन-दीदार को पहुंचे बाबा पापड़कर का कहना है कि इस यात्रा से उनके मिशन को बल मिलेगा।

28 सालों से जारी सेवा का सफर : नांदेड़ साहिब से कुछ समाज सेवियों की टीम के साथ पिंगलवाड़ा देखने तथा दरबार साहिब के दर्शन के दौरान दैनिक भास्कर ऑफिस पहुंचे बाबा जी ने बताया कि मजबूर और मजलूमों की सेवा तथा पर्यावरण को लेकर उनके भीतर पहले से ही संवेदना थी। 1990 में इसे अमली रूप देने के लिए अपने खुद के बच्चों की जिम्मेदारी से मुक्ति ले ली और अमरावती जिले के मेलघाट के पास स्थित गांव वज्झर की पहाड़ियों पर महात्मा गांधी दिव्यांग एवं पुनर्वास केंद्र स्थापित किया। वहां पर शारीरिक रूप से दिव्यांग और मंदबुद्धि बच्चों तथा पेड़-पौधों को पोसने का सिलसिला शुरू कर किया।

मानव और पर्यावरण सेवा

शंकर बाबा पापड़कर।

महाराष्ट्र के बाबा पापड़कर 28 साल से सेवा निभाते आ रहे हैं

138 दिव्यांगों के पिता

पापड़कर पहाड़ी पर बने अपने उक्त आश्रम में 138 दिव्यांग व मंदबुद्धि बच्चों की परवरिस कर रहे हैं। इन बच्चों को वह पिता की जगह अपना नाम देते हैं। इसमें से वह 15 लड़कियों की शादी भी कर चुके हैं और दो-तीन शादी के बाद भी आश्रम में रह रही हैं। 25 एकड़ में फैले उक्त आश्रम में गुरुकुल की तर्ज पर बच्चों का पालन-पोषण होता है। वह इनको आत्मनिर्भर होने के लिए तैयार करते हैं।

15,000 पेड़-पौधों के माली

बाबा जी ने बताया कि उन्होंने आश्रम के आसपास हर्बल तथा दुर्लभ प्रजाति के 15,000 पेड़-पौधों को तैयार किया है। इसके कारण पूरा इलाका कुदरती नजारों से भरपूर है। बच्चे कुदरत से इतना जुड़े हैं कि पेड़-पौधों के साथ भाई-बहन की तरह से रहते हैं। यहां पर बच्चे जल संरक्षण और पर्यावरण संभाल में पूरा योगदान देते हैं।

किसी को दान मत दो आत्मनिर्भर बनाओ

बाबा जी ने बताया कि दिव्यांगों के प्रति अक्सर सरकारें व लोग दान व तरह की भावना रखते हैं, जो कि गलत है। उनका मानना है कि ऐसे बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश होनी चाहिए। उनका कहना है कि अक्सर अनाथालयों या आश्रम में पल रहे बच्चों को मिलने वाली मदद 18 साल की उम्र होने पर बंद हो जाती है। उनकी सरकार से मांग है कि इस उम्र में उनको मदद की जरूरत होती है और यह मदद जारी रहनी चाहिए। उनकी सेवा को देखते हुए सरकार ने उन्हें 2008 में पद्मश्री सम्मान देने की पेशकश की थी लेकिन उन्होंने यह कहते हुए उसे लेने से इंकार कर दिया कि इससे उनके बच्चों व पेड़-पौधों को क्या लाभ मिलेगा?

खबरें और भी हैं...